मेरी भावना (जिसने राग द्वेष कामादिक जीते)
मेरी भावना ही पंडित जुगलकिशोरजी मुख्तार 'युगवीर' यांनी रचलेली अत्यंत लोकप्रिय आणि हृदयस्पर्शी प्रार्थना आहे. ही प्रार्थना जैन धर्मातील उदात्त जीवनमूल्ये, अहिंसा, मैत्री आणि वैराग्य भाव स्पष्ट करते.
समता भाव: सुख-दुःखात आणि शत्रु-मित्रांमध्ये समान भाव ठेवणे.
परहित: इतरांच्या प्रगतीचा आनंद वाटणे आणि कोणाचाही द्वेष न करणे.
सत्य व अहिंसा: प्राणांपेक्षाही धर्माचे (सत्याचे) पालन करणे श्रेष्ठ मानणे.
जिसने राग द्वेष कामादिक जीते, सब जग जान लिया।
सब जीवों को मोक्षमार्ग का स्पृह हो उपदेश दिया॥
बुद्ध, वीर, जिन, हरि, हर, ब्रह्मा, या उसको स्वाधीन कहो।
भक्ति-भाव से प्रेरित हो यह चित्त उसी में लीन रहो॥ १ ॥
विषयों की आशा नहीं जिनके, साम्य-भाव धन रखते हैं।
निज-परके हित-साधन में जो निश-दिन तत्पर रहते हैं॥
स्वार्थ-त्याग की कठिन तपस्या बिना खेद जो करते हैं।
ऐसे ज्ञानी साधु जगत के दुःख-समूह को हरते हैं॥ २ ॥
रहे सदा सत्संग उन्हीं का, ध्यान उन्हीं का नित्य रहे।
उन्ही जैसी चर्या में यह चित्त सदा अनुरत्त रहे॥
नहीं सताऊं किसी जीव को, झूठ कभी नहीं कहा करूं।
परधन-वनिता¹ पर न लुभाऊँ, संतोषामृत पिया करूँ॥ ३ ॥
रहे भावना ऐसी मेरी, सरल-सत्य-व्यवहार करूं।
बने जहां तक इस जीवन में औरों का उपकार करूँ॥ ४ ॥
मैत्रीभाव जगत में मेरा सब जीवों से नित्य रहे।
दीन-दुखी जीवों पर मेरे उर से करुणा-स्रोत बहे॥
दुर्जन-क्रूर-कुमार्ग-रतों पर क्षोभ नहीं मुझको आवे।
साम्यभाव रखूं मैं उन पर, ऐसी परिणति हो जावे॥ ५ ॥
होऊं नहीं कृतघ्न कभी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे।
गुण-ग्रहण का भाव रहे नित, दृष्टि न दोषों पर जावे॥ ६ ॥
कोई बुरा कहो या अच्छा, लक्ष्मी आवे या जावे।
अनेक वर्षों तक जीऊं या, मृत्यु आज ही आ जावे॥
अथवा कोई कैसा ही भय या लालच देने आवे।
तो भी न्याय-मार्ग से मेरा कभी न पग डिगने पावे॥ ७ ॥
होकर सुख में मग्न न फूले, दुःख में कभी न घबरावे।
पर्वत-नदी-श्मशान भयानक अटवी से नहीं भय खावे॥
रहे अडोल-अकंप निरंतर, यह मन दृढ़तर बन जावे।
इष्ट-वियोग, अनिष्ट-योग में सहन-शीलता दिखलावे॥ ८ ॥
सुखी रहें सब जीव जगत के, कोई कभी न घबरावे।
बैर-पाप-अभिमान छोड़ जग, नित्य नये मंगल गावे॥
घर-घर चर्चा रहे धर्म की, दुष्कृत दुष्कर हो जावें।
ज्ञान-चरित उन्नत कर अपना मनुज-जन्म-फल सब पावें॥ ९ ॥
ईति भीति व्यापे नहीं जग में, वृष्टि समय पर हुआ करे।
धर्मनिष्ठ होकर राजा भी न्याय प्रजा का किया करे॥
रोग मरी दुर्भिक्ष न फैले, प्रजा शांति से जिया करे।
परम अहिंसा-धर्म जगत में, फैल सर्व हित किया करे॥ १० ॥
बनकर सब 'युगवीर' हृदय से देशोन्नति-रत रहा करें।
वस्तु-स्वरूप-विचार खुशी से सब दुख संकट सहा करें॥ ११ ॥
मुख्य विचार:
मैत्री व करुणा: जगतातील सर्व प्राण्यांबद्दल मैत्री आणि दयाभाव असणे.समता भाव: सुख-दुःखात आणि शत्रु-मित्रांमध्ये समान भाव ठेवणे.
परहित: इतरांच्या प्रगतीचा आनंद वाटणे आणि कोणाचाही द्वेष न करणे.
सत्य व अहिंसा: प्राणांपेक्षाही धर्माचे (सत्याचे) पालन करणे श्रेष्ठ मानणे.
जिसने राग द्वेष कामादिक जीते, सब जग जान लिया।
सब जीवों को मोक्षमार्ग का स्पृह हो उपदेश दिया॥
बुद्ध, वीर, जिन, हरि, हर, ब्रह्मा, या उसको स्वाधीन कहो।
भक्ति-भाव से प्रेरित हो यह चित्त उसी में लीन रहो॥ १ ॥
विषयों की आशा नहीं जिनके, साम्य-भाव धन रखते हैं।
निज-परके हित-साधन में जो निश-दिन तत्पर रहते हैं॥
स्वार्थ-त्याग की कठिन तपस्या बिना खेद जो करते हैं।
ऐसे ज्ञानी साधु जगत के दुःख-समूह को हरते हैं॥ २ ॥
रहे सदा सत्संग उन्हीं का, ध्यान उन्हीं का नित्य रहे।
उन्ही जैसी चर्या में यह चित्त सदा अनुरत्त रहे॥
नहीं सताऊं किसी जीव को, झूठ कभी नहीं कहा करूं।
परधन-वनिता¹ पर न लुभाऊँ, संतोषामृत पिया करूँ॥ ३ ॥
अहंकार का भाव न रखूं, नहीं किसी पर क्रोध करूँ।
देख दूसरों की बढ़ती को कभी न ईर्ष्या-भाव धरूँ॥रहे भावना ऐसी मेरी, सरल-सत्य-व्यवहार करूं।
बने जहां तक इस जीवन में औरों का उपकार करूँ॥ ४ ॥
मैत्रीभाव जगत में मेरा सब जीवों से नित्य रहे।
दीन-दुखी जीवों पर मेरे उर से करुणा-स्रोत बहे॥
दुर्जन-क्रूर-कुमार्ग-रतों पर क्षोभ नहीं मुझको आवे।
साम्यभाव रखूं मैं उन पर, ऐसी परिणति हो जावे॥ ५ ॥
गुणी जनों को देख हृदय में मेरे प्रेम उमड़ आवे।
बने जहां तक उनकी सेवा करके यह मन सुख पावे॥होऊं नहीं कृतघ्न कभी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे।
गुण-ग्रहण का भाव रहे नित, दृष्टि न दोषों पर जावे॥ ६ ॥
कोई बुरा कहो या अच्छा, लक्ष्मी आवे या जावे।
अनेक वर्षों तक जीऊं या, मृत्यु आज ही आ जावे॥
अथवा कोई कैसा ही भय या लालच देने आवे।
तो भी न्याय-मार्ग से मेरा कभी न पग डिगने पावे॥ ७ ॥
होकर सुख में मग्न न फूले, दुःख में कभी न घबरावे।
पर्वत-नदी-श्मशान भयानक अटवी से नहीं भय खावे॥
रहे अडोल-अकंप निरंतर, यह मन दृढ़तर बन जावे।
इष्ट-वियोग, अनिष्ट-योग में सहन-शीलता दिखलावे॥ ८ ॥
सुखी रहें सब जीव जगत के, कोई कभी न घबरावे।
बैर-पाप-अभिमान छोड़ जग, नित्य नये मंगल गावे॥
घर-घर चर्चा रहे धर्म की, दुष्कृत दुष्कर हो जावें।
ज्ञान-चरित उन्नत कर अपना मनुज-जन्म-फल सब पावें॥ ९ ॥
ईति भीति व्यापे नहीं जग में, वृष्टि समय पर हुआ करे।
धर्मनिष्ठ होकर राजा भी न्याय प्रजा का किया करे॥
रोग मरी दुर्भिक्ष न फैले, प्रजा शांति से जिया करे।
परम अहिंसा-धर्म जगत में, फैल सर्व हित किया करे॥ १० ॥
बनकर सब 'युगवीर' हृदय से देशोन्नति-रत रहा करें।
वस्तु-स्वरूप-विचार खुशी से सब दुख संकट सहा करें॥ ११ ॥