छहढाला

स्तोत्र आणि चालिसा · भजन · पं दौलतराम
छहढाला हा जैन धर्मातील अत्यंत लोकप्रिय, सोपा आणि मूलभूत सिद्धांत सांगणारा एक महान ग्रंथ आहे. या ग्रंथाची रचना पंडित दौलतरामजी यांनी १९ व्या शतकात (विक्रम संवत १८९५) केली होती. अवघ्या ६ ढालांमध्ये (अध्यायांमध्ये) संपूर्ण जैन धर्माचे तत्त्वज्ञान, अध्यात्म आणि मोक्षमार्ग अतिशय सोप्या भाषेत मांडल्यामुळे या ग्रंथाला 'जैन धर्माची प्राथमिक शाळा' किंवा 'लघु तत्वार्थ सूत्र' असेही म्हटले जाते.

मंगलाचरण (दोहा)
त्रिभुवन में सार वीतराग-विज्ञानता।
शिवस्वरूप शिवकार नमहुँ त्रियोग सँहारिके॥
अन्वयार्थ : 
त्रिभुवन में सर वीतराग-विज्ञान: तीनों लोकों (अधोलोक, मध्यलोक, उर्ध्वलोक) में अगर कोई चीज़ सबसे अच्छी, सच्ची और ज़रूरी है, तो वो है 'वीतराग विज्ञान' (क्रोध और नफ़रत से मुक्त और खुद का शुद्ध ज्ञान)।
शिव स्वरूप शिवकर: यह वीतराग विज्ञान 'शिव स्वरूप' (कल्याणकारी/मोक्ष स्वरूप) है और यह 'शिव कर' (आत्मा को मोक्ष/कल्याण दिलाने वाला) है।
नमहुं त्रियोग संहारी के: मैं अपने तीनों योगों (मन, वाणी और शरीर) को मिलाकर, एक मन और पूरी भक्ति के साथ, इस परम कल्याणकारी वीतराग विज्ञान/वीतराग देव को नमन करता हूँ।

ग्रन्थ-रचना का उद्देश्य और जीवों की इच्छा

जे त्रिभुवन में जीव अनंत, सुख चाहें दुःखतै भयवंत
तातैं दुखहारी सुखकार, कहैं सीख गुरु करुणा धार ॥१॥
अन्वयार्थ : [त्रिभुवन में] तीनों लोकों में [जे] जो [अनन्त] अनन्त [जीव] प्राणी (हैं वे) [सुख] सुख की [चाहैं] इच्छा करते हैं और [दुखतैं] दुःख से [भयवन्त] डरते हैं [तातैं] इसलिये [गुरू] आचार्य [करूणा] दया [धार] करके [दुःखहारी] दुःख का नाश करनेवाली और [सुखकार] सुख को देनेवाली [सीख] शिक्षा [कहैं] कहते हैं ।


गुरु-शिक्षा सुनने का आदेश तथा संसार-परिभ्रमण का कारण

ताहि सुनो भवि मन थिर आन, जो चाहो अपनो कल्यान
मोह महामद पियो अनादि, भूल आपको भरमत वादि ॥२॥
अन्वयार्थ : [भवि] हे भव्यजीवों ! [जो] यदि [अपनो] अपना [कल्यान] हित [चाहो] चाहते हो (तो) [ताहि] गुरू की वह शिक्षा [मन] मन को [थिर] स्थिर [आन] करके [सुनो] सुनो (कि इस संसार में प्रत्येक प्राणी) [अनादि] अनादिकाल से [मोह महामद] मोहरूपी महामदिरा [पिया] पीकर, [आपको] अपने आत्मा को [भूल] भूलकर [वादि] व्यर्थ [भरमत] भटक रहा है ।


इस ग्रन्थ की प्रामाणिकता और निगोद का दुःख

तास भ्रमण की है बहु कथा, पै कुछ कहूँ कही मुनि यथा
काल अनंत निगोद मंझार, बीत्यो एकेंद्री तन धार ॥३॥
अन्वयार्थ : [तास] उस संसार में [भ्रमन की] भटकने की [कथा] कथा [बहु] बड़ी [है] है [पै] तथापि [यथा] जैसी [मुनि] पूर्वाचार्यों ने [कही] कहीं है (तदनुसार मैं भी) [कछु] थोड़ी-सी [कहूं] कहता हूं (कि इस जीव का) [निगोद मझार] निगोद में [एकेन्द्री] एकेन्द्रिय जीव के [तन] शरीर [धार] धारण करके [अनंत] अनंत [काल] काल [वीत्यो] व्यतीत हुआ है ।


निगोद का दुःख और वहाँ से निकलकर प्राप्त की हुई पर्यायें

एक श्वास में अठदस बार, जन्म्यो मर्यो भर्यो दुखभार
निकसि भूमि जल पावक भयो, पवन प्रत्येक वनस्पति थयो ॥४॥
अन्वयार्थ : (निगोद में यह जीव) [एक श्वास में] एक सांस में [अठदस बार] अठारह बार [जन्म्यो] जनमा और [मरयो] मरा (तथा) [दुखभार] दुःखों के समूह [भरयो] सहन किये (और वहां से) [निकसि] निकलकर [भूमि] पृथ्वीकायिक, [जल] जलकायिक, [पावक] अग्निकायिक [भयो] हुआ तथा [पवन] वायुकायिक (और) [प्रत्येक वनस्पति] प्रत्येक वनस्पतिकायिक जीव [थयो] हुआ ।


तिर्यंचगति में त्रसपर्याय की दुर्लभता और उसका दुःख

दुर्लभ लहि ज्यों चिन्तामणि, त्यों पर्याय लही त्रसतणी
लट पिपील अलि आदि शरीर, धर धर मर्यो सही बहु पीर ॥५॥
अन्वयार्थ : [ज्यों] जिसप्रकार [चिन्तामणि] चिन्तामणि-रत्न [दुर्लभ] कठिनाई से [लहि] प्राप्त होता है [त्यों] उसीप्रकार [त्रसतणी] त्रस-पर्याय (बड़ी कठिनाई से) [लहि] प्राप्त हुई । (वहां भी) [लट] इल्ली [पिपील] चींटी [अलि] भंवरा [आदि] इत्यादि के [शरीर] शरीर [धर धर] बारम्बार धारण करके [मरयो] मरण को प्राप्त हुआ (और) [बहु पीर] अत्यन्त पीड़ा [सही] सहन की ।


तिर्यंचगति में असंज्ञी तथा संज्ञी के दुःख

कबहूँ पंचेन्द्रिय पशु भयो, मन बिन निपट अज्ञानी थयो
सिंहादिक सैनी ह्वै क्रूर, निबल पशु हति खाये भूर ॥६॥
अन्वयार्थ : (यह जीव) [कबहूं] कभी [पंचेन्द्रिय] पंचेन्द्रिय [पशु] तिर्यंच [भयो] हुआ (तो) [मन बिन] मन के बिना [निपट] अत्यंत [अज्ञानी] मूर्ख [थयो] हुआ (और) [सैनी] संज्ञी (भी) [ह्वै] हुआ (तो) [सिंहादिक] सिंह आदि [क्रूर] क्रूर जीव [ह्वै] होकर [निबल] अपने से निर्बल, [भूर] अनेक [पशु] तिर्यंच [हति] मार-मारकर [खाये] खाये ।


तिर्यंचगति में निर्बलता तथा दुःख

कबहूँ आप भयो बलहीन, सबलनि करि खायो अतिदीन
छेदन भेदन भूख पियास, भार-वहन, हिम, आतप त्रास ॥७॥
अन्वयार्थ : (यह जीव तिर्यंच गति में) [कबहूं] कभी [आप] स्वयं [बलहीन] निर्बल [भयो] हुआ (तो) [अतिदीन] असमर्थ होने से [सबलनि करि] अपने से बलवान प्राणियों द्वारा [खायो] खाना गया (और) [छेदन] छेदा जाना, [भेदन] भेदा जाना, [भूख] भूख [पियास] प्यास, [भार-वहन] बोझ ढोना, [हिम] ठण्ड [आतप] गर्मी (आदि के) [त्रास] दुःख सहन किये ।


तिर्यंच के दुःख की अधिकता और नरक गति की प्राप्ति का कारण

बध बंधन आदिक दुख घने, कोटि जीभ तैं जात न भने
अति संक्लेश भावतैं मर्यो, घोर श्वभ्रसागर में पर्यो ॥८॥
अन्वयार्थ : (इस तिर्यंचगति में जीव ने अन्य भी) [वध] मारा जाना, [बंधन] बंधना [आदिक] आदि [घने] अनेक [दुख] दुःख सहन किये; (वे) [कोटि] करोड़ों [जीभतैं] जीभों से [भने न जात] नहीं कहे जा सकते । (इस कारण) [अति संक्लेश] अत्यंत बुरे [भावतैं] परिणामों से [मरयो] मारकर [घोर] भयानक [श्वभ्रसागर में] नरकरूपी समुद्र में [परयो] जा गिरा ।


नरकों की भूमि और नदियों का वर्णन

तहाँ भूमि परसत दुख इसो, बिच्छू सहस डसे नहिं तिसो
तहाँ राध-श्रोणितवाहिनी, कृमि-कुल-कलित, देह-दाहिनी ॥९॥
अन्वयार्थ : [तहां] उन नरक में [भूमि] धरती [परसत] स्पर्श करने से [इसो] ऐसा [दुख] दुःख होता है (कि) [सहस] हजारों [बिच्छू] बिच्छू [डसे] डंक मारें, तथापि [नहिं तिसो] उसने समान दुःख नहीं होता (तथा) [तहां] वहां (नरक में) [राधा-श्रोणितवाहिनी] रक्त और मवाद बहानेवाली नदी (वैतरणी नामक नदी) है, जो [कृमिकुललित] छोटे-छोटे क्षुद्र कीड़ों से भरी हैं तथा [देहदाहिनी] शरीर में दाह उत्पन्न करनेवाली है ।


नरकों के सेमल वृक्ष तथा सर्दी-गर्मी के दुःख

सेमर तरु दलजुत असिपत्र, असि ज्यों देह विदारैं तत्र
मेरु समान लोह गलि जाय, ऐसी शीत उष्णता थाय ॥१०॥
अन्वयार्थ : [तत्र] उन नरको में, [असिपत्र ज्यों] तलवार की धार की भांति तीक्ष्ण [दलजुत] पत्तोंवाले [सेमर तरू] सेमल के वृक्ष (हैं, जो) [देह] शरीर को [असि ज्यों] तलवार की भांति [विदारैं] चीर देते हैं (और) [तत्र] वहां (उस नरक में) [ऐसी] ऐसी [शीत] ठण्ड (और) [उष्णता] गरमी [थाय] होती है (कि) [मेरू समान] मेरू पर्वत के बाराबर [लोह] लोहे का गोला भी [गलि] गल जाय ।


नरकों में अन्य नारकी, असुरकुमार तथा प्यास का दुःख

तिल-तिल करैं देह के खण्ड, असुर भिड़ावैं दुष्ट प्रचण्ड
सिन्धुनीर तैं प्यास न जाय, तो पण एक न बूँद लहाय ॥११॥
अन्वयार्थ : (उन नरकों में नारकी जीव एक-दूसरे के ) [देह के] शरीर के [तिल-तिल] तिल्ली के दाने बराबर [खण्ड] टुकड़े [करें] कर डालते हैं (और) [प्रचण्ड] अत्यंत [दुष्ट] क्रूर [असुर] असुरकुमार जाति के देव (एक-दूरे के साथ) [भिड़ावैं] लड़ाते हैं; (तथा इतनी) (प्यास) प्यास (लगती है कि) [सिन्धुनीर तैं] समुद्रभर पानी पीने से भी (न जाय) शांत न हो, (तो पण) तथापि (एक बूंद) एक बूंदी भी (न लहाय) नहीं मिलती ।


नरकों की भूख, आयु और मनुष्यगति प्राप्ति का वर्णन

तीनलोक को नाज जु खाय, मिटै न भूख कणा न लहाय
ये दुख बहु सागर लौं सहै, करम जोगतैं नरगति लहै ॥१२॥
अन्वयार्थ : (उन नरकों में इतनी भूख लगती है कि) [तीन लोक को] तीनों लोक का [नाज] अनाज [जुखाय] खा जाये तथापि [भूख] क्षुधा [न मिटै] शांत न हो (परंतु खाने के लिए) [कणा] एक दाना भी [न लहाय] नही मिलता। [ये दुख] ऐसे दुःख [बहु सागर लौं] अनेक सागरोपम काल तक [सहै] सहन करता है, [कमर जोगतैं] किसी विशेष शुभ-कर्म के योग से [नरगति] मनुष्य-गति [लहै] प्राप्त करता है ।


मनुष्यगति में गर्भ-निवास तथा प्रसवकाल के दुःख

जननी उदर वस्यो नव मास, अंग सकुचतैं पायो त्रास
निकसत जे दुख पाये घोर, तिनको कहत न आवे ओर ॥१३॥
अन्वयार्थ : (मनुष्यगति में भी यह जीव) [नव मास] नौ महीने तक [जननी] माता के [उदर] पेट में [वस्यो] रहा; (तब वहां) [अंग] शरीर [सकुचतैं] सिकोड़कर रहने से [त्रास] दुःख [पायो] पाया (और) [निकसत] निकलते समय [जे] जो [घोर] भयंकर [दुख पाये] दुःख पाये [तिलको] उन दुःखों को [कहत] कहने से [ओर] अंत [न आवे] नहीं आ सकता ।


मनुष्यगति में बाल, युवा और वृद्धावस्था के दुःख

बालपने में ज्ञान न लह्यो, तरुण समय तरुणी-रत रह्यो
अर्ध-मृतक-सम बूढ़ापनो, कैसे रूप लखै आपनो ॥१४॥
अन्वयार्थ : (मनुष्यगति में) [बालपने में] बचपन में [ज्ञान] ज्ञान [न लह्यो] प्राप्त नहीं कर सका (और) [तरूण समय] युवावस्था में [तरूणी-रत] युवती स्त्री में लीन [रह्यो] रहा, (और) [बूढापनो] वृद्धावस्था [अर्धमृतकसम] अधमरा जैसा (रहा, ऐसी दशा में) [कैसे] किस प्रकार (जीव) [अपनी] अपना [रूप] स्वरूप [लखै] देखे - विचारे ।


देवगति में भवनत्रिक का दुःख

कभी अकामनिर्जरा करै, भवनत्रिक में सुरतन धरै
विषय-चाह-दावानल दह्यो, मरत विलाप करत दुख सह्यो ॥१५॥
अन्वयार्थ : (इस जीव ने) [कभी] कभी [अकाम निर्जरा] अकाम निर्जरा [करै] की (तो मरने के पश्चात्) [भवनत्रिक] भवनवासी, व्यंतर और ज्योतिषी में [सुरतन] देवपर्याय [धरै] धारण की, (परंतु वहां भी) [विषय चाह] पांच इन्द्रियों के विषयों की इच्छारूपी [दावानल] भयंकर अग्नि में [दह्यो] जलता रहा (और) (मरत) मरते समय [विलाप करत] रो-रोकर [दुख सह्यो] दुःख सहन किया ।


देवगति में वैमानिक देवों का दुःख

जो विमानवासी हू थाय, सम्यग्दर्शन बिन दुख पाय
तहँतें चय थावर तन धरै, यों परिवर्तन पूरे करै ॥१६॥
अन्वयार्थ : [जो] यदि [विमानवासी] वैमानिक देव [हू] भी [थाय] हुआ (तो वहां) [सम्यग्दर्शन] सम्यग्दर्शन [बिना] बिना [दुख] दुःख [पाय] प्राप्त किया (और) [तहंतैं] वहां से [चय] मरकर [थावर तन] स्थावर जीव का शरीर [धरै] धारण करता है; [यों] इसप्रकार (यह जीव) [परिवर्तन] पांच परावर्तन [पूरे करै] पूर्ण करता रहता है ।


संसार में परिभ्रमण का कारण

ऐसे मिथ्या दृग-ज्ञान-चर्णवश, भ्रमत भरत दुख जन्म-मर्ण
तातैं इनको तजिये सुजान, सुन तिन संक्षेप कहूँ बखान ॥१॥
अन्वयार्थ : [मिथ्यादृग-ज्ञान-चर्णवश] मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र के वश होकर [ऐसे] इस प्रकार [भ्रमत भरत दुख जन्म-मरण ] जन्म और मरण के दुःखों को भोगता हुआ भटकता फिरता है । [तातैं इनको] इसलिये इन (तीनों) को [तजिये सुजान] भली-भाँति जानकर छोड़ना चाहिये । [सुन तिन संक्षेप कहूँ बखान] इनका संक्षेप से वर्णन करता हूँ, उसे सुनो ।


अगृहीत-मिथ्यादर्शन और जीवतत्त्व का लक्षण

जीवादि प्रयोजनभूत तत्त्व, सरधैं तिनमाहिं विपर्ययत्व
चेतन को है उपयोग रूप, बिनमूरत चिन्मूरत अनूप ॥२॥
अन्वयार्थ : [जीवादि] जीव आदि (जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष) प्रयोजनभूत तत्त्व हैं, [सरधैं तिनमांहि विपर्ययत्व] उनमें विपरीत श्रद्धान करना (सो अग्रहीत मिथ्यादर्शन है); [चेतन को है उपयोग रूप] आत्मा का स्वरूप उपयोग (दर्शन-ज्ञान) है, और वह [बिनमूरत चिन्मूरत अनूप] अमूर्तिक, चैतन्यमय और उपमा-रहित है ।


जीव-तत्त्व के विषय में मिथ्यात्व

पुद्गल नभ धर्म अधर्म काल, इनतैं न्यारी है जीव चाल
ताकों न जान विपरीत मान, करि करै देह में निज पिछान ॥३॥
अन्वयार्थ : पुद्गल [नभ] आकाश, धर्म, अधर्म, काल [इनतैं] इनसे [न्यारी है जीव चाल] जीव का स्वभाव भिन्न है; (तथापि मिथ्यादृष्टि जीव) [ताकों न जान] उस (स्वभाव) को नहीं जानता और विपरीत [मान करि] मानकर [देह में निज पिछान] शरीर में आत्मा की पहिचान करता है ।


मिथ्यादृष्टि का शरीर तथा पर-वस्तुओं सम्बन्धी विचार

मैं सुखी दुखी मैं रंक राव, मेरे धन गृह गो-धन प्रभाव
मेरे सुत तिय मैं सबल दीन, बेरूप सुभग मूरख प्रवीण ॥४॥
अन्वयार्थ : (मिथ्यादृष्टि जीव मिथ्यादर्शन के कारण से मानता है कि) [मैं सुखी दुखी] मैं सुखी हूँ, दुःखी हूँ, [रंक राव] निर्धन हूँ, राजा हूँ, [मेरे धन] मेरे यहाँ रुपया-पैसा आदि [गृह गोधन] घर, गाय-भैंस आदि [प्रभाव] बड़प्पन (है; और) [मेरे सुत] मेरी संतान तथा [तिय] मेरी स्त्री है; [मैं सबल] मैं बलवान, [दीन] निर्बल, [बेरूप] कुरूप, [सुभग] सुन्दर, [मूरख] मूर्ख और [प्रवीण] चतुर हूँ ।


अजीव और आस्रव-तत्त्व की विपरीत श्रद्धा

तन उपजत अपनी उपज जान, तन नशत आपको नाश मान
रागादि प्रगट ये दु:ख देन, तिनही को सेवत गिनत चैन ॥५॥
अन्वयार्थ : (मिथ्यादृष्टि जीव) [तन] शरीर के [उपजत] उत्पन्न होने से [अपनी] अपना आत्मा [उपज] उत्पन्न हुआ [जान] मानता है और [तन] शरीर के [नशत] नाश होने से [आपको] आत्मा का [नाश] मरण हुआ ऐसा [मान] मानता है । [रागादि] राग, द्वेष, मोहादि [ये प्रगट] जो स्पष्ट रूप से [दुख देन] दुःख देनेवाले हैं, [तिनही को] उनकी [सेवत] सेवाता हुआ [चैन गिनत] सुख मानता है ।


बन्ध और संवर तत्त्व की विपरीत श्रद्धा

शुभ-अशुभ बंध के फल मंझार, रति-अरति करै निज पद विसार
आतमहित हेतु विराग ज्ञान, ते लखै आपको कष्टदान ॥६॥
अन्वयार्थ : (मिथ्यादृष्टि जीव) [निजपद] आत्मा के स्वरूप को [विसार] भूलकर [बंध के] कर्म-बन्ध के [शुभ] अच्छे [फल मंझार] फल में [रति] प्रेम [करै] करता है और कर्म-बन्ध के [अशुभ] बुरे फल से [अरति] द्वेष करता है; (तथा जो) [विराग] राग-द्वेष का अभाव (अपने यथार्थ स्वभाव में स्थिरतारूप सम्यक्चारित्र) और [ज्ञान] सम्यग्ज्ञान (और सम्यग्दर्शन) [आतमहित] आत्मा के हित के [हेतु] कारण हैं, [ते] उन्हें [आपको] आत्मा को [कष्टदान]
दुःख देनेवाले [लखै] मानता है ।


निर्जरा और मोक्ष की विपरीत श्रद्धा तथा अगृहीत मिथ्याज्ञान

रोकी न चाह निजशक्ति खोय, शिवरूप निराकुलता न जोय
याही प्रतीतिजुत कछुक ज्ञान, सो दुखदायक अज्ञान जान ॥७॥
अन्वयार्थ : (मिथ्यादृष्टि जीव) [निजशक्ति] अपने आत्मा की शक्ति [खोय] खोकर [चाह] इच्छा को [न रोकी] नहीं रोकता, और [निराकुलता] आकुलता के अभाव को [शिवरूप] मोक्ष का स्वरूप [न जोय] नहीं मानता । [याही] इस [प्रतीतिजुत] मिथ्या मान्यता सहित [कछुक ज्ञान] जो कुछ ज्ञान है [सो] वह [दुखदायक] कष्ट देनेवाला [अज्ञान] अगृहीत मिथ्याज्ञान है - ऐसा [जान] समझना चाहिए ।


अगृहीत मिथ्याचारित्र (कुचारित्र) का लक्षण

इन जुत विषयनि में जो प्रवृत्त, ताको जानो मिथ्याचरित्त
यों मिथ्यात्वादि निसर्ग जेह, अब जे गृहीत, सुनिये सु तेह ॥८॥
अन्वयार्थ : [जो] जो [विषयनि में] पाँच इन्द्रियों के विषयों में [इन जुत] इस-रूप (अगृहीत मिथ्यादर्शन तथा अगृहीत मिथ्याज्ञान सहित) [प्रवृत्त] प्रवृत्ति करता है [ताको] उसे [मिथ्याचरित्त] अगृहीत मिथ्याचारित्र [जानो] समझो । [यों] इस प्रकार [निसर्ग] अगृहीत [मिथ्यात्वादि] मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र है (वर्णन किया गया है) [अब जे गृहीत] अब जो गृहीत [मिथ्यादर्शन, ज्ञान, चारित्र ] है [तेह सुनिये] उसे सुनो ।


गृहीत मिथ्यादर्शन और कुगुरु के लक्षण

जे कुगुरु कुदेव कुधर्म सेव, पोषैं चिर दर्शनमोह एव
अंतर रागादिक धरैं जेह, बाहर धन अम्बरतैं सनेह ॥९॥
धारैं कुलिंग लहि महत भाव, ते कुगुरु जन्मजल उपलनाव
जो राग-द्वेष मलकरि मलीन, वनिता गदादिजुत चिह्न चीन ॥१०॥
अन्वयार्थ : जो [कुगुरु कुदेव कुधर्म सेव] मिथ्या-गुरु, मिथ्या-देव और मिथ्या-धर्म की सेवा करता है, वह [पोषैं चिर दर्शनमोह एव] अति दीर्घकाल तक मिथ्यादर्शन ही पोषता है । [अंतर रागादिक धरैं जेह] कुगुरु अंतर में मिथ्यात्व-राग-द्वेष आदि धारण करता है और [बाहर धन अम्बरतैं सनेह] बाह्य में धन तथा वस्त्रादि से प्रेम रखता है ।
[धारैं कुलिंग लहि महत भाव] महात्मापने का भाव ग्रहण करके मिथ्यावेषों को धारण करता है, [ते कुगुरु जन्मजल उपलनाव] ऐसा कुगुरु संसाररूपी समुद्र में पत्थर की नौका के समान है (खुद भी डूबता है और शिष्यों को भी डुबोता है)[जे राग-द्वेष मलकरि मलीन] जो (कुदेव) राग-द्वेषरूपी मैल से मलिन हैं और [वनिता गदादि जुत चिह्न चीन] स्त्री, गदा आदि सहित चिह्नों से पहिचाने जाते हैं ।


कुधर्म और गृहीत मिथ्यादर्शन का संक्षिप्त लक्षण

ते हैं कुदेव तिनकी जु सेव, शठ करत न तिन भवभ्रमण छेव
रागादि भावहिंसा समेत, दर्वित त्रस थावर मरण खेत ॥११॥
जे क्रिया तिन्हैं जानहु कुधर्म, तिन सरधै जीव लहै अशर्म
याकूँ गृहीत मिथ्यात्व जान, अब सुन गृहीत जो है अज्ञान ॥१२॥
अन्वयार्थ : [ते हैं कुदेव] वे झूठे देव हैं, [तिनकी जु सेव शठ] उनकी जो मूर्ख सेवा करते हैं, [करत न तिन भवभ्रमण छेव] उनका संसार में भ्रमण करना नहीं मिटता । [रागादि भावहिंसा समेत] राग-द्वेष आदि भाव-हिंसा सहित तथा [दर्वित त्रस-थावर मरण खेत] त्रस और स्थावर मरण का स्थान द्रव्यहिंसा समेत (कुधर्म है)
[जे क्रिया तिन्हैं] जो (पूर्व-कतिथ) क्रियाएँ हैं उन्हें [जानहु कुधर्म] मिथ्याधर्म जानना चाहिये । [तिन सरधै जीव] उनकी श्रद्धा करने से आत्मा [लहै अशर्म] दुःख पाते हैं । [याकूं] इनको (कुगुरु, कुदेव और कुधर्म का श्रद्धान करने को) गृहीत मिथ्यादर्शन जानना, अब गृहीत मिथ्याज्ञान जिसे कहा जाता है उसका वर्णन सुनो ।


गृहीत मिथ्याज्ञान का लक्षण

एकान्तवाद-दूषित समस्त, विषयादिक पोषक अप्रशस्त
कपिलादि रचित श्रुत को अभ्यास, सो है कुबोध बहु देन त्रास ॥१३॥
अन्वयार्थ : अर्थात् – अनेक धर्मात्मक वस्तु के किसी एक ही धर्म को समस्त वस्तु कहने के कारण, दूषित तथा विषय कषाय आदि को पुष्ट करने वाले कपिल आदि कुगुरूओं के बनाये हुए सब प्रकार के खोटे शास्त्रों का पढ्ना, पढाना, सुनना, सुनाना, गृहीत मिथ्याज्ञान कहलाता है ।


गृहीत मिथ्याचारित्र का लक्षण

जो ख्याति लाभ पूजादि चाह, धरि करन विविध विध देहदाह
आतम अनात्म के ज्ञानहीन, जे जे करनी तन करन छीन ॥१४॥
अन्वयार्थ : शरीर और आत्मा का भेदविज्ञान न होने से जो यश, धनसंपत्ति, आदर-सत्कार आदि की इच्छा से मानादि कषाय के वशीभूत होकर शरीर को क्षीण करनेवाली अनेक प्रकार की क्रियाएँ करता है, उसे "गृहीत मिथ्याचारित्र'' कहते हैं ।


मिथ्याचारित्र के त्याग का तथा आत्महित में लगने का उपदेश

ते सब मिथ्याचारित्र त्याग, अब आतम के हित पंथ लाग
जगजाल-भ्रमण को देहु त्याग, अब दौलत! निज आतम सुपाग ॥१५॥
अन्वयार्थ : आत्महितैषी जीव को निश्चय सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र ग्रहण करके गृहीत मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्र तथा अगृहीत मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्र का त्याग करके आत्मकल्याण के मार्ग में लगना चाहिए । श्री पण्डित दौलतरामजी अपनी आत्मा को सम्बोधन करके कहते हैं कि - हे आत्मन्! पराश्रयरूप संसार अर्थात् पुण्य-पाप में भटकना छोड़कर सावधानी से आत्मस्वरूप में लीन हो ॥


आत्महित, सच्चा सुख वा द्विविध मोक्षमार्ग का लक्षण

आतम को हित है सुख सो सुख, आकुलता-बिन कहिये
आकुलता शिवमाहिं न तातैं, शिव-मग लाग्यो चहिये ॥
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरन शिव-मग सो द्विविध विचरो
जो सत्यारथ रूप सो निश्चय, कारण सो व्यवहारो ॥१॥
अन्वयार्थ : [आतम को हित] आत्मा का कल्याण [है सुख] है सुख की प्राप्ति, [सो सुख] वह सुख [आकुलता बिन] आकुलता रहित [कहिये] कहा जाता है । [आकुलता] आकुलता [शिवमांहि न] मोक्ष में नहीं है, [तातैं शिवमग] इसलिये मोक्षमार्ग में [लाग्यो चहिये] लगना चाहिये । [सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरन] सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र इन तीनों की एकता वह [शिवमग] मोक्ष का मार्ग है । [सो] उस (मोक्षमार्ग) का [द्विविध] दो प्रकार से [विचारो] विचार करना चाहिये कि [जो] जो [सत्यारथरूप] वास्तविक स्वरूप है [सो] वह [निश्चय] निश्चय-मोक्षमार्ग है और [कारण] जो निश्चय-मोक्षमार्ग का निमित्त कारण है [सो] उसे [व्यवहारो] व्यवहार-मोक्षमार्ग कहते हैं ।


निश्चय सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र का लक्षण

परद्रव्यनतै भिन्न आपमें, रुचि सम्यक्त्व भला है
आपरूप को जानपनो सो, सम्यग्ज्ञान कला है ॥
आपरूप में लीन रहे थिर, सम्यक्चारित्र सोई
अब व्यवहार मोक्ष मग सुनिये, हेतु नियत को होई ॥२॥
अन्वयार्थ : [आप में] आत्मा में [परद्रव्यनतैं] पर-वस्तुओं से [भिन्न] भिन्नत्व की [रुचि] श्रद्धा करना सो [भला] निश्चय [सम्यक्त्व] सम्यग्दर्शन है; [आपरूप को] आत्मा के स्वरूप को [परद्रव्यनतैं भिन्न] पर-द्रव्यों से भिन्न [जानपनों] जानना [सो] वह [सम्यग्ज्ञान] निश्चय सम्यग्ज्ञान [कला] प्रकाश [है] है ।
[परद्रव्यनतैं भिन्न] पर-द्रव्यों से भिन्न ऐसे [आपरूप में] आत्म-स्वरूप में [थिर] स्थिरतापूर्वक [लीन रहे] लीन होना सो [सम्यक्चारित] निश्चय सम्यक्चारित्र [सोई] है । [अब] अब [व्यवहार मोक्षमग] व्यवहार-मोक्षमार्ग [सुनिये] सुनो कि जो व्यवहार मोक्षमार्ग [नियतको] निश्चय-मोक्षमार्ग का [हेतु] निमित्त कारण [होई] है ।


व्यवहार सम्यग्दर्शन का स्वरूप

जीव अजीव तत्त्व अरु आस्रव, बंध रु संवर जानो
निर्जर मोक्ष कहे जिन तिनको, ज्यों का त्यों सरधानों
है सोई समकित व्यवहारी, अब इन रूप बखानो
तिनको सुन सामान्य विशेषैं, दिढ प्रतीत उर आनो ॥३॥
अन्वयार्थ : [जिन] जिनेन्द्रदेव ने [जीव] जीव, [अजीव] अजीव, [आस्रव] आस्रव, [बन्ध] बन्ध, [संवर] संवर, [निर्जरा] निर्जरा, [अरु] और [मोक्ष] मोक्ष [तत्त्व] यह सात तत्त्व [कहे] कहे हैं; [तिनको] उन सबकी [ज्योंका त्यों] यथावत्-यथार्थरूप से [सरधानो] श्रद्धा करो । [सोई] इस प्रकार श्रद्धा करना सो [समकित व्यवहारी] व्यवहारसे सम्यग्दर्शन है । अब [इन रूप] इन सात तत्त्वों के रूप का [बखानो] वर्णन करते हैं; [तिनको] उन्हें [सामान्य विशेषैं] संक्षेप से तथा विस्तार से [सुन] सुनकर [उर] मनमें [दिढ़] अटल [प्रतीत] श्रद्धा [आनो] करो ।


जीव के भेद, बहिरात्मा और उत्तम अंतरात्मा का लक्षण

बहिरातम अन्तर आतम परमातम जीव त्रिधा है
देह जीव को एक गिनै बहिरातम तत्त्व मुधा है ॥
उत्तम मध्यम जघन त्रिविध के, अन्तर आतम ज्ञानी
द्विविध संग बिन शुध उपयोगी, मुनि उत्तम निज ध्यानी ॥४॥
अन्वयार्थ : [बहिरातम] बहिरात्मा, [अन्तरआतम] अन्तरात्मा [और ] [परमातम] परमात्मा [इस प्रकार ] [जीव त्रिधा है] जीव तीन प्रकार के हैं; (उनमें) [देह जीवको] शरीर और आत्मा को [एक गिने] एक मानते हैं वे [बहिरातम] बहिरात्मा हैं [और वे बहिरात्मा ] [तत्त्वमुधा] यथार्थ तत्त्वों से अजान अर्थात् तत्त्वमूढ़ मिथ्यादृष्टि हैं । [आतमज्ञानी] आत्मा को पर-वस्तुओं से भिन्न जानकर यथार्थ निश्चय करनेवाले [अन्तरआतम] अन्तरात्मा [कहलाते हैं; वे ] [उत्तम] उत्तम [मध्यम] मध्यम और [जघन] जघन्य –ऐसे [त्रिविध] तीन प्रकार के हैं; (उनमें) [द्विविध] दो प्रकार के (अंतरंग तथा बहिरंग) [संगबिन] परिग्रह रहित [शुध उपयोगी] शुद्ध उपयोगी [निजध्यानी] आत्मध्यानी [मुनि] दिगम्बर मुनि [उत्तम] उत्तम अन्तरात्मा हैं ।


मध्यम और जघन्य अन्तरात्मा तथा सकल परमात्मा

मध्यम अन्तर आतम हैं जे, देशव्रती अनगारी
जघन कहे अविरत समदृष्टि, तीनों शिव-मग चारी ॥
सकल निकल परमातम द्वैविध, तिनमें घाति निवारी
श्री अरिहन्त सकल परमातम, लोकालोक निहारी ॥५॥
अन्वयार्थ : [अनगारी] अन्तरंग और बहिरंग परिग्रह रहित यथाजातरूपधर भावलिंगी मुनि मध्यम अन्तरात्मा हैं तथा [देशव्रती] दो कषाय के अभाव सहित ऐसे पंचम गुणस्थानवर्ती सम्यग्दृष्टि श्रावक [मध्यम] मध्यम [अन्तर-आतम] अन्तरात्मा [हैं] हैं और [अविरत] व्रतरहित [समदृष्टि] सम्यग्दृष्टि जीव [जघन] जघन्य अन्तरात्मा [कहे] कहलाते हैं; [तीनों] यह तीनों [शिवमगचारी] मोक्षमार्ग पर चलनेवाले हैं । [सकल निकल] सकल और निकल के भेद से [परमातम] परमात्मा [द्वैविध] दो प्रकार के हैं [तिनमें] उनमें [घाति] चार घातिकर्मों को [निवारी] नाश करनेवाले [लोकालोक] लोक तथा अलोक को [निहारी] जानने-देखनेवाले [श्री अरिहन्त] अरहन्त परमेष्ठी [सकल] शरीर सहित [परमातम] परमात्मा हैं ।


निकल परमात्मा का लक्षण वा परमात्मा के ध्यान का उपदेश

ज्ञानशरीरी त्रिविध कर्म-मल वर्जित सिद्ध महंता
ते हैं निकल अमल परमातम, भोगैं शर्म अनंता ॥
बहिरातमता हेय जानि तजि, अन्तर आतम हूजे
परमातम को ध्याय निरन्तर, जो नित आनंद पूजै ॥६॥
अन्वयार्थ : [ज्ञानशरीरी] ज्ञानमात्र जिनका शरीर है ऐसे [त्रिविध] ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्म, रागादि भावकर्म तथा औदारिक शरीरादि नोकर्म–ऐसे तीन प्रकारके [कर्ममल] कर्मरूपी मैल से [वर्जित] रहित, [अमल] निर्मल और [महन्ता] महान [सिद्ध] सिद्ध परमेष्ठी [निकल] निकल [परमातम] परमात्मा हैं ।
वे [अनन्त] अपरिमित [शर्म] सुख [भोगैं] भोगते हैं । इन तीनों में [बहिरातमता] बहिरात्मपने को [हेय] छोड़ने योग्य [जानि] जानकर और [तजि] उसे छोड़कर [अन्तर आतम] अन्तरात्मा [हूजै] होना चाहिये और [निरन्तर] सदा [परमातमको] [निज ] परमात्मपद का [ध्याय] ध्यान करना चाहिए; [जो] जिसके द्वारा [नित] अर्थात् निरंतर [आनन्द] आनन्द [पूजै] प्राप्त किया जाता है ।


अजीव तत्त्व का लक्षण वा भेद

चेतनता-बिन सो अजीव है, पंच भेद ताके हैं
पुद्गल पंच वरन-रस गंध दो, फरस वसु जाके हैं ॥
जिय पुद्गल को चलन सहाई, धर्मद्रव्य अनुरूपी
तिष्ठत होय अधर्म सहाई, जिन बिनमूर्ति निरूपी ॥७॥
अन्वयार्थ : जो [चेतनता-बिन] चेतनता रहित है [सो] वह [अजीव] अजीव है; [ताके] उस अजीवके [पंच भेद] पाँच भेद हैं; [जाके पंच वरन-रस] जिसके पाँच वर्ण और रस, दो गन्ध और [वसू] आठ [फ रस] स्पर्श [हैं] होते हैं, वह पुद्गलद्रव्य है । जो [जिय] जीव को (और) [पुद्गल को] पुद्गल को [चलन सहाई] चलने में निमित्त [और ] [अनरूपी] अमूर्तिक है वह [धर्म] धर्म-द्रव्य है तथा [तिष्ठत] गतिपूर्वक स्थिति-परिणाम को प्राप्त (जीव और पुद्गल को) [सहाई] निमित्त [होय] होता है वह [अधर्म] अधर्म द्रव्य है । [जिन] जिनेन्द्र भगवान ने उस अधर्म-द्रव्य को [बिन-मूर्ति] अमूर्तिक, [निरूपी] अरूपी कहा है ।


आकाश, काल और आस्रव के लक्षण वा भेद

सकल द्रव्य को वास जास में, सो आकाश पिछानो
नियत वर्तना निशिदिन सो, व्यवहार काल परिमानो ॥
यों अजीव, अब आस्रव सुनिये, मन-वच-काय त्रियोगा
मिथ्या अविरत अरु कषाय परमाद सहित उपयोगा ॥८॥
अन्वयार्थ : [जास में] जिसमें [सकल] समस्त [द्रव्य को] द्रव्यों का [वास] निवास है [सो] वह [आकाश] आकाश द्रव्य [पिछानो] जानना; [वर्तना] स्वयं प्रवर्तित हो और दूसरों को प्रवर्तित होने में निमित्त हो वह [नियत] निश्चय काल-द्रव्य है; तथा [निशिदिन] रात्रि, दिवस आदि [व्यवहारकाल] व्यवहारकाल [परिमानो] जानो । [यों] इस प्रकार [अजीव] अजीव-तत्त्व का वर्णन हुआ । [अब] अब [आस्रव] आस्रव-तत्त्व [सुनिये] सुनो । [मन-वच-काय] मन, वचन और काया के आलम्बन से आत्मा के प्रदेश चंचल होनेरूप [त्रियोगा] तीन प्रकार के योग तथा मिथ्यात्व, अविरत, कषाय [अरु] और [परमाद] प्रमाद [सहित] सहित [उपयोगा] उपयोग आत्मा की प्रवृत्ति वह [आस्रव] आस्रव-तत्त्व कहलाता है ।


आस्रव त्याग का उपदेश और बंध, संवर ,निर्जरा का लक्षण

ये ही आतम को दुखकारण, तातैं इनको तजिये
जीव प्रदेश बंधै विधिसों सो बन्धन कबहूं न सजिये ॥
शम-दमतैं जो कर्म न आवैं, सो संवर आदरिये
तप-बलतैं विधि झरन निरजरा ताहि सदा आचरिये ॥९॥
अन्वयार्थ : [ये ही] यह मिथ्यात्वादि ही [आतमको] आत्मा को [दुःख-करण] दुःख के कारण हैं, [तातैं] इसलिये [इनको] इन मिथ्यात्वादि को [तजिये] छोड़ देना चाहिये [जीव-प्रदेश] आत्मा के प्रदेशों का [विधि सों] कर्मों से [बन्धै] बँधना वह [बंधन] बन्ध है [सो] वह (बन्ध) [कबहुँ] कभी भी [न सजिये] नहीं करना चाहिये । [शम] कषायों का अभाव (और) [दम तैं] इन्द्रियों तथा मन को जीतने से [कर्म] कर्म [न आवैं] नहीं आयें वह [संवर] संवर-तत्त्व है; [ताहि] उस संवर को [आदरिये] ग्रहण करना चाहिये । [तपबल तैं] तप की शक्ति से [विधि] कर्मों का [झरन] एकदेश खिर जाना सो [निरजरा] निर्जरा है । [ताहि] उस निर्जरा को [सदा] सदैव [आचरिये] प्राप्त करना चाहिये ।


मोक्ष का लक्षण, व्यवहार सम्यक्त्व का लक्षण तथा कारण

सकल कर्म तैं रहित अवस्था, सो शिव थिर सुखकारी
इहिविधि जो सरधा तत्त्वन की, सो समकित व्यवहारी ॥
देव जिनेन्द्र, गुरु परिग्रह बिन, धर्म दयाजुत सारो
येहु मान समकित को कारण, अष्ट-अंग-जुत धारो ॥१०॥
अन्वयार्थ : [सकल कर्मतैं] समस्त कर्मों से [रहित] रहित [थिर] स्थिर-अटल [सुखकारी] अनन्त सुखदायक [अवस्था] दशा-पर्याय सो [शिव] मोक्ष कहलाता है । [इहि विध] इस प्रकार [जो] जो [तत्त्वन की] सात तत्त्वों के भेद सहित [सरधा] श्रद्धा करना सो [व्यवहारी] व्यवहार [समकित] सम्यग्दर्शन है । [जिनेन्द्र] वीतराग, सर्वज्ञ और हितोपदेशी [देव] सच्चे देव [परिग्रह बिन] चौबीस परिग्रह से रहित [गुरु] वीतराग गुरु (तथा) [सारो] सारभूत [दयाजुत] अहिंसामय [धर्म] जैनधर्म [येहु] इन सबको [समकितको] सम्यग्दर्शन का [कारण] निमित्त कारण [मान] जानना चाहिये । सम्यग्दर्शन को उसके [अष्ट] आठ [अंगजुत] अंगों सहित [धारो] धारण करना चाहिये ।


सम्यक्त्व के पच्चीस दोष और आठ गुण

वसु मद टारि निवारि त्रिशठता, षट् अनायतन त्यागो
शंकादिक वसु दोष बिना, संवेगादिक चित पागो
अष्ट अंग अरु दोष पचीसों, तिन संक्षेप हु कहिये
बिन जानें तैं दोष गुननकों, कैसे तजिये गहिये ॥११॥
अन्वयार्थ : [वसु मद टारि] आठ मद का त्याग करके, [निवारि त्रिशठता] तीन प्रकार की मूढता को हटाकर, [षट् अनायतन] छह अनायतनों का [त्यागो] त्याग करना चाहिये । [शंकादिक वसु] शंकादि आठ [दोष विना] दोषों से रहित होकर [संवेगादिक] संवेग, अनुकम्पा, आस्तिक्य और प्रशम में [चित] मनको [पागो] लगाना चाहिये । अब, सम्यक्त्व के [अष्ट अंग अरु] आठ अंग और [पचीसों दोष] पच्चीस दोषों को [संक्षेपै] संक्षेप में [कहिये] कहा जाता है; क्योंकि [बिन जाने तैं] उन्हें जाने बिना [दोष] दोषों को [कैसे] किस प्रकार [तजिये] छोड़ें और [गुनन को] गुणों को किस प्रकार [गहिये] ग्रहण करें ?


सम्यक्त्व के आठ अंगों और शंकादिक आठ दोषों के लक्षण

जिन वच में शंका न धार वृष, भव -सुख वांछा भानै
मुनि तन मलिन न देख घिनावै, तत्त्व कुतत्त्व पिछानै ॥
निजगुण अरु पर औगुण ढांकै, वा निज धर्म बढावै
कामादिक कर वृषतैं, चिगते, निज पर को सु दिढावै ॥१२॥
धर्मीसों गौ वच्छ प्रीति सम, कर जिनधर्म दिपावै
इन गुणतैं विपरीत दोष वसु, तिनकों सतत खिपावै ॥
अन्वयार्थ : [जिन वचमें] सर्वज्ञदेव के कहे हुए तत्त्वों में [शंका] संशय-सन्देह [न धार] धारण नहीं करना (सो निःशंकित अंग है); [वृष] धर्म को [धार] धारण करके [भव-सुख-वाँछा] सांसारिक सुखों की इच्छा [भानै] न करे (सो निःकांक्षित अंग है); [मुनि-तन] मुनियों के शरीरादि [मलिन] मैले [देख] देखकर [न घिनावै] घृणा न करना (सो निर्विचिकित्सा अंग है); [तत्त्व-कुतत्त्व] सच्चे और झूठे तत्त्वों की [पिछानै] पहिचान रखे (सो अमूढ़दृष्टि अंग है); [निजगुण] अपने गुणों को [अरु] और [पर औगुण] दूसरे के अवगुणों को [ढाँके] छिपाये [वा] तथा [निजधर्म] अपने आत्म-धर्म को [बढ़ाये] बढ़ये अर्थात् निर्मल बनाए (सो उपगूहन अंग है); [कामादिक कर] काम-विकारादि के कारण [वृषतैं] धर्म से [चिगते] च्युत होते हुए [निज-परको] अपने को तथा पर को [सु दिढावै] उसमें पुनः दृढ़ करे (सो स्थितिकरण अंग है); [धर्मीसों] अपने साधर्मीजनों से [गौ-वच्छ-प्रीति सम] बछड़े पर गाय की प्रीति समान [कर] प्रेम रखना (सो वात्सल्य अंग है) और [जिनधर्म] जैनधर्म की [दिपावै] शोभा में वृद्धि करना (सो प्रभावना अंग है); [इन गुणतैं] इन (आठ) गुणों से [विपरीत] उल्टे [वसु] आठ [दोष] दोष हैं, [तिनको] उन्हें [सतत] हमेशा [खिपावै] दूर करना चाहिये ।


सम्यक्त्व के मदनामक आठ दोष

पिता भूप वा मातुल नृप जो, होय न तो मद ठानै
मद न रूप को मद न ज्ञान को, धन बल को मद भानै ॥१३॥
तपकौ मद न मद जु प्रभुता को, करै न सो निज जानै
मद धारै तौ यही दोष वसु, समकित को मल ठानै ॥
अन्वयार्थ : (जो जीव) [जो] यदि [पिता] पिता आदि पितृपक्ष के स्वजन [भूप] राजादि [होय] हों [तौ] तो [मद] अभिमान [न ठानै] नहीं करता, (यदि) [मातुल] मामा आदि मातृपक्ष के स्वजन [नृप होय] राजादि हों तो [मद न] अभिमान नहीं करता, [ज्ञान कौ] विद्या का [मद न] अभिमान नहीं करता, [धन कौ] लक्ष्मी का [मद भानै] अभिमान नहीं करता, [बल कौ] शक्ति का [मद भानै] अभिमान नहीं करता, [तप कौ] तप का [मद न] अभिमान नहीं करता, [जु] और [प्रभुताकौ] ऐश्वर्य, बड़प्पनका [मद न करै] अभिमान नहीं करता [सो] वह [निज] अपने आत्माको [जानै] जानता है । (यदि जीव उनका) [मद] अभिमान [धारै] रखता है तो [यही वसु] ऊपर कहे हुए मद आठ [दोष] दोष रूप होकर [समकितकौ] सम्यक्त्वको-सम्यक्दर्शन को [मल ठानै] दूषित करते हैं ।


सम्यक्त्व के छः अनायतन दोष और तीन मूढता दोष

कुगुरू-कुदेव-कुवृष-सेवक की, नहीं प्रशंस उचरै है
जिनमुनि जिनश्रुत बिन, कुगुरादिक, तिन्हें न नमन करै है ॥१४॥
अन्वयार्थ : (सम्यग्दृष्टि जीव) [कुगुरु-कुदेव-कुवृष-सेवक की] कुगुरु, कुदेव और कुधर्म-सेवक की [प्रशंस] प्रशंसा [नहिं उचरै है] नहीं करता । [जिन] जिनेन्द्रदेव [मुनि] वीतरागी मुनि [और ] [जिनश्रुत] जिनवाणी [विन] के अतिरिक्त (जो) [कुगुरादि] कुगुरु, कुदेव, कुधर्म हैं [तिन्हें] उन्हें [नमन] नमस्कार [न करै है] नहीं करता ।


सम्यक्त्व का महत्व

दोष रहित गुण सहित सुधी जे, सम्यक् दरश सजै हैं
चरित मोहवश लेश न संजम, पै सुरनाथ जजै हैं ॥
गेही पै गृह में न रचै ज्यों, जलतैं भिन्न कमल है
नगरनारि को प्यार यथा कादे में हेम अमल है ॥१५॥
अन्वयार्थ : [जे] जो [सुधी] बुद्धिमान पुरुष (ऊपर कहे हुए) [दोष रहित] पच्चीस दोष रहित (तथा) [गुणसहित] निःशंकादि आठ गुणों सहित [सम्यग्दरश] सम्यग्दर्शन से [सजैं हैं] भूषित हैं [उन्हें ] [चरितमोहवश] (अप्रत्याख्यानावरणीय) चारित्रमोहनीय कर्म के उदयवश [लेश] किंचित् भी [संजम] संयम [न] नहीं है [पै] तथापि [सुरनाथ] देवों के स्वामी इन्द्र (उनकी) [जजैं हैं] पूजा करते हैं; (यद्यपि वे) [गेही] गृहस्थ हैं [पै] तथापि [गृह में] घर में [न रचैं] नहीं रचते । [ज्यों] जिस प्रकार [कमल] कमल [जलतैं] जल से [भिन्न] भिन्न है [तथा ] [यथा] जिस प्रकार [कादे में] कीचड़ में [हेम] सुवर्ण [अमल है] शुद्ध रहता है, (उसीप्रकार उनका घर में) [नगरनारि कौ] वेश्या के [प्यार यथा] प्रेम की भाँति [प्यार] प्रेम (होता है)


सम्यग्दृष्टि कहां कहां उत्पन्न नहीं होता तथा सर्वोत्तम सुख

प्रथम नरक बिन षट भू ज्योतिष, वान भवन षंड नारी
थावर विकलत्रय पशु में नहिं उपजत सम्यकधारी ॥
तीन-लोक तिहुं-काल माहिं नहिं, दर्शन सो सुखकारी
सकल धरम को मूल यही इस, बिन करनी दुखकारी ॥१६॥
अन्वयार्थ : [सम्यक्धारी] सम्यग्दृष्टि जीव [प्रथमनरक विन] पहले नरक के अतिरिक्त [षट् भू] शेष छह नरकों में, [ज्योतिष] ज्योतिषी देवों में, [वान] व्यंतर देवों में, [भवन] भवनवासी देवों में [षंढ] नुपंसकों में [नारी] स्त्रियों में, [थावर] पाँच स्थावरों में, [विकलत्रय] द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय जीवों में तथा [पशु में] पशुओं में [नहिं उपजत] उत्पन्न नहीं होते । [तीनलोक] तीनलोक [तिहुंकाल] तीनकाल में [दर्शन सो] सम्यग्दर्शन के समान [सुखकारी] सुखदायक [नहिं] अन्य कुछ नहीं है, [यही] यह सम्यग्दर्शन ही [सकल धरमको] समस्त धर्मों का [मूल] मूल है; [इस बिन] इस सम्यग्दर्शन के बिना [करनी] समस्त क्रियाएँ [दुखकारी] दुःखदायक हैं ।


सम्यग्दर्शन के बिना ज्ञान चारित्र के मिथ्यापना

मोक्षमहल की परथम सीढी, या बिन ज्ञान चरित्रा
सम्यकता न लहैं सो दर्शन, धारो भव्य पवित्रा ॥
दौल समझ सुन चेत सयाने, काल वृथा मत खोवै
यह नरभव फिर मिलन कठिन है, जो सम्यक नहिं होवै ॥१७॥
अन्वयार्थ : (यह सम्यग्दर्शन) [मोक्षमहल की] मोक्षरूपी महल की [परथम] प्रथम [सीढ़ी] सीढ़ी है; [या बिन] इस (सम्यग्दर्शन) के बिना [ज्ञान चरित्रा] ज्ञान और चारित्र [सम्यक्ता] सच्चाई [न लहै] प्राप्त नहीं करते; इसलिये [भव्य] हे भव्य जीवों ! [सो] ऐसे [पवित्रा] पवित्र [दर्शन] सम्यग्दर्शन को [धारो] धारण करो । [सयाने 'दौल'] हे समझदार दौलतराम ! [सुन] सुन [समझ] समझ और [चेत] सावधान हो, [काल] समय को [वृथा] व्यर्थ [मत खोवै] न गँवा; (क्योंकि) [जो] यदि [सम्यक्] सम्यग्दर्शन [नहिं होवै] नहीं हुआ तो [यह] यह [नरभव] मनुष्य पर्याय [फिर] पुनः [मिलन] मिलना [कठिन है] दुर्लभ है ।


सम्यग्ज्ञान की प्रेरणा

सम्यक् श्रद्धा धारि पुनि, सेवहु सम्यग्ज्ञान
स्व-पर अर्थ बहु धर्मजुत, जो प्रकटावन भान ॥१॥
अन्वयार्थ : [सम्यक् श्रद्धा] सम्यग्दर्शन [धारि] धारण करके[पुनि] फि र [सम्यग्ज्ञान] सम्यग्ज्ञानका [सेवहु] सेवन करो; (जो सम्यग्ज्ञान) [बहु धर्मजुत] अनेक धर्मात्मक [स्व-पर अर्थ] अपना और दूसरे पदार्थोंका [प्रगटावन] ज्ञान करानेमें [भान] सूर्य समान है ।


सम्यक्दर्शन और ज्ञान में भेद

सम्यक् साथै ज्ञान होय, पै भिन्न अराधौ
लक्षण श्रद्धा जान, दुहू में भेद अबाधौ
सम्यक् कारण जान, ज्ञान कारज है सोई
युगपत् होते हू, प्रकाश दीपकतैं होई ॥२॥
अन्वयार्थ : [सम्यक् साथै] सम्यग्दर्शनके साथ[ज्ञान] सम्यग्ज्ञान [होय] होता है । [पै] तथापि (उन दोनोंको) [भिन्न] भिन्न [अराधौ] समझना चाहिये; क्योंकि [लक्षण] उन दोनोंके लक्षण (क्रमशः) [श्रद्धा] श्रद्धा करना और [जान] जानना है तथा [सम्यक्] सम्यग्दर्शन [कारण] कारण है और [ज्ञान] सम्यग्ज्ञान [कारज] कार्य है । [सोई] यह भी [दुहूमें] दोनोंमें [भेद] अन्तर [अबाधौ] निर्बाध है । (जिसप्रकार) [युगपत्] एक साथ [होते हू] होने पर भी [प्रकाश] उजाला [दीपकतैं] दीपककी ज्योतिसे [होई] होता है उसीप्रकार ।


सम्यग्ज्ञान के भेद

तास भेद दो हैं, परोक्ष परतछि तिन माहिं
मति श्रुत दोय परोक्ष, अक्ष मनतैं उपजाहीं
अवधिज्ञान मनपर्जय दो हैं देश-प्रतच्छा
द्रव्य क्षेत्र परिमाण लिये जानै जिय स्वच्छा ॥३॥
अन्वयार्थ : [तास] उस सम्यग्ज्ञानके [परोक्ष] परोक्षऔर [परतछि] प्रत्यक्ष [दो] दो [भेद हैं] भेद हैं; [तिन मांहीं]उनमें [मति श्रुत] मतिज्ञान और श्रुतज्ञान [दोय] यह दोनों [परोक्ष] परोक्षज्ञान हैं । (क्योंकि वे) [अक्ष मनतैं] इन्द्रियों तथामनके निमित्तसे [उपजाहीं] उत्पन्न होते हैं । [अवधिज्ञान] अवधिज्ञान और [मनपर्जय] मनःपर्ययज्ञान [दो] यह दोनों ज्ञान[देश-प्रतच्छा] देशप्रत्यक्ष [हैं] हैं; (क्योंकि इन ज्ञानोंसे) [जिय]जीव [द्रव्य क्षेत्र परिमाण] द्रव्य और क्षेत्रकी मर्यादा [लिये] लेकर[स्वच्छा] स्पष्ट [जानै] जानता है ।


केवलज्ञान

सकल द्रव्य के गुन अनंत, परजाय अनंता
जानैं एकै काल, प्रकट केवलि भगवन्ता
ज्ञान समान न आन जगत में सुख कौ कारन
इहि परमामृत जन्मजरामृति-रोग-निवारन ॥४॥
अन्वयार्थ : (जिस ज्ञान से) [केवलि भगवन्ता] केवलज्ञानी भगवान [सकल द्रव्य के] छहों द्रव्यों के [अनन्त] अपरिमित [गुन] गुणों को और [अनन्ता] अनन्त [परजाय] पर्यायों को [एकै काल] एक साथ [प्रगट] स्पष्ट [जानै] जानते हैं (उस ज्ञान को) [सकल] सकल-प्रत्यक्ष अथवा केवलज्ञान कहते हैं । [जगत में] इस जगत में [ज्ञान समान] सम्यग्ज्ञान जैसा [आन] दूसरा कोई पदार्थ [सुख कौ] सुख का [न कारन] कारण नहीं है । [इहि] यह सम्यग्ज्ञान ही [जन्मजरामृति-रोग-निवारन] जन्म, जरा (वृद्धावस्था) और मृत्युरूपी रोगों को दूर करने के लिये [परमामृत] उत्कृष्ट अमृत-समान है ।


ज्ञानी और अज्ञानी में अंतर

कोटि जन्म तप तपैं, ज्ञान बिन कर्म झरैं जे
ज्ञानी के छिनमांहि त्रिगुप्ति तैं सहज टरैं ते
मुनिव्रत धार अनन्तबार ग्रीवक उपजायो
पै निज आतमज्ञान बिना, सुख लेश न पायौ ॥५॥
अन्वयार्थ : [ज्ञान बिना] सम्यग्ज्ञान के बिना [कोटि जन्म] करोड़ों जन्मों तक [तप तपैं] तप करने से [जे कर्म] जितने कर्म [झरैं] नाश होते हैं [ते] उतने कर्म [ज्ञानी के] सम्यग्ज्ञानी जीव के [त्रिगुप्ति तैं] मन, वचन और काय की ओर की प्रवृत्ति को रोकने से (निर्विकल्प शुद्ध स्वभाव से) [छिन में] क्षणमात्र में [सहज] सरलता से [टरै] नष्ट हो जाते हैं । (यह जीव) [मुनिव्रत] मुनियों के महाव्रतों को [धार] धारण करके [अनन्तबार] अनन्तबार [ग्रीवक] नवें ग्रैवेयक तक [उपजायो] उत्पन्न हुआ, [पै] परन्तु [निज आतम] अपने आत्मा के [ज्ञान विना] ज्ञान बिना [लेश] किंचित्मात्र [सुख] सुख [न पायो] प्राप्त न कर सका ।


दुर्लभ मनुष्य पर्याय ज्ञानाभ्यास द्वारा सफल

तातैं जिनवर-कथित तत्त्व अभ्यास करीजे
संशय विभ्रम मोह त्याग, आपो लख लीजे
यह मानुष पर्याय, सुकुल, सुनिवौ जिनवानी
इह विध गये न मिले, सुमणि ज्यौं उदधि समानी ॥६॥
अन्वयार्थ : [तातैं] इसलिये [जिनवर-कथित] जिनेन्द्र भगवान के कहे हुए [तत्त्व] परमार्थ तत्त्व का [अभ्यास] अभ्यास [करीजे] करना चाहिये और [संशय] संशय [विभ्रम] विपर्यय तथा [मोह] अनध्यवसाय (अनिश्चितता) को [त्याग] छोड़कर [आपो] अपने आत्मा को [लख लीजे] लक्ष में लेना चाहिये अर्थात् जानना चाहिये । (यदि ऐसा नहीं किया तो) [यह] यह [मानुष पर्याय] मनुष्य भव [सुकुल] उत्तम कुल और [जिनवानी] जिनवाणी का [सुनिवौ] सुनना [इह विध] ऐसा सुयोग [गये] बीत जाने पर, [उदधि] समुद्र में [समानी] समाये-डूबे हुए [सुमणि ज्यौं] सच्चे रत्न की भाँति (पुनः) [न मिलै] मिलना कठिन है ।


ज्ञान की महिमा

धन समाज गज बाज, राज तो काज न आवै
ज्ञान आपकौ रूप भये, फिर अचल रहावै
तास ज्ञान को कारन, स्व-पर विवेक बखानौ
कोटि उपाय बनाय भव्य, ताको उर आनौ ॥७॥
अन्वयार्थ : [धन] पैसा, [समाज] परिवार, [गज] हाथी, [बाज] घोड़ा, [राज] राज्य [तो] तो [काज] अपने काममें [न आवै] नहीं आते; किन्तु [ज्ञान] सम्यग्ज्ञान [आपको रूप] आत्मा का स्वरूप (जो) [भये] प्राप्त होने के [फिर] पश्चात् [अचल] अचल [रहावै] रहता है । [तास] उस [ज्ञान को] सम्यग्ज्ञान का [कारन] कारण [स्व-पर विवेक] आत्मा और परवस्तुओं का भेदविज्ञान [बखानौ] कहा है, (इसलिये) [भव्य] हे भव्य जीवों ! [कोटि] करोड़ों [उपाय] उपाय [बनाय] करके [ताको] उस भेदविज्ञान को [उर आनौ] हृदय में धारण करो ।


सम्यग्ज्ञान की महिमा

जे पूरब शिव गये, जाहिं, अरु आगे जैहैं
सो सब महिमा ज्ञान-तनी, मुनिनाथ कहै हैं
विषय-चाह दव-दाह, जगत-जन अरनि दझावै
तास उपाय न आन, ज्ञान-घनघान बुझावै ॥८॥
अन्वयार्थ : [पूरव] पूर्वकाल में [जे] जो जीव [शिव] मोक्ष में [गये] गये हैं, (वर्तमानमें) [जाहिं] जा रहे हैं [अरु] और [आगे] भविष्य में [जैहैं] जायेंगे [सो] वह [सब] सब [ज्ञान-तनी] सम्यग्ज्ञान की [महिमा] महिमा है -- ऐसा [मुनिनाथ] जिनेन्द्रदेव ने कहा है । [विषय-चाह] पाँच इन्द्रियों के विषयों की इच्छारूपी [दव-दाह] भयंकर दावानल [जगत-जन] संसारी जीवों रूपी [अरनि] अरण्य (पुराने वन) को [दझावै] जला रहा है [तास] उसकी शान्ति का [उपाय] उपाय [आन] दूसरा [न] नहीं है; (मात्र) [ज्ञान-घनघान] ज्ञानरूपी वर्षाका समूह [बुझावै] शान्त करता है ।


सम्पूर्ण कथन का सार

पुण्य-पाप-फलमाहिं, हरख बिलखौ मत भाई
यह पुद्गल परजाय, उपजि विनसै फिर थाई
लाख बात की बात यही, निश्चय उर लाओ
तोरि सकल जग दंद-फंद, नित आतम ध्याओ ॥९॥
अन्वयार्थ : [भाई] हे आत्मार्थी प्राणी ! [पुण्य-फलमाहिं] पुण्य के फल में [हरख मत] हर्ष न कर और [पाप-फलमाहिं] पाप के फल में [विलखौ मत] द्वेष न कर (क्योंकि यह पुण्य और पाप) [पुद्गल परजाय] पुद्गल की पर्यायें हैं । (वे) [उपजि] उत्पन्न होकर [विनसै] नष्ट हो जाती हैं और [फिर] पुनः [थाई] उत्पन्न होती हैं । [उर] अपने अन्तर में [निश्चय] निश्चयसे - वास्तव में [लाख बातकी बात] लाखों बातों का सार [यही] इसीप्रकार [लाओ] ग्रहण करो कि [सकल] पुण्य-पापरूप समस्त [जग-दंद-फंद] जन्म-मरण के द्वन्द (राग-द्वेष) रूप विकारी- मलिन भाव [तोरि] तोड़कर [नित] सदैव [आतम ध्याओ] अपने आत्मा का ध्यान करो ।


अणुव्रत की प्रेरणा

सम्यज्ञानी होय, बहुरि दिढ़ चारित लीजै
एकदेश अरु सकलदेश, तसु भेद कहीजै
त्रसहिंसा को त्याग, वृथा थावर न सँहारै
पर-वधकार कठोर निंद्य नहिं वयन उचारै ॥१०॥
अन्वयार्थ : [सम्यग्ज्ञानी] सम्यग्ज्ञानी [होय] होकर [बहुरि] फिर [दिढ़] दृढ़ [चारित] सम्यक्चारित्र [लीजै] का पालन करना चाहिये; [तसु] उसके (उस सम्यक्चारित्र के) [एकदेश] एकदेश [अरु] और [सकलदेश] सर्वदेश (ऐसे दो) [भेद] भेद [कहीजै] कहे गये हैं । (उनमें) [त्रसहिंसा को] त्रस जीवों की हिंसा का [त्याग] त्याग करना और [वृथा] बिना कारण [थावर] स्थावर जीवों का [न सँहारै] घात न करना (वह अहिंसा-अणुव्रत कहलाता है) [पर-वधकार] दूसरों को दुःखदायक [कठोर] कठोर (और) [निंद्य] निंद्यनीय [वयन] वचन [नहिं उचारै] न बोलना (वह सत्य-अणुव्रत कहलाता है ।)


गुणव्रत

जल-मृतिका बिन और नाहिं कछु गहै अदत्ता
निज वनिता बिन सकल नारिसौं रहै विरत्ता
अपनी शक्ति विचार, परिग्रह थोरो राखै
दश दिश गमन प्रमाण ठान, तसु सीम न नाखै ॥११॥
अन्वयार्थ : [जल-मृतिका विन] पानी और मिट्टी के अतिरिक्त [और कछु] अन्य कोई वस्तु [अदत्ता] बिना दिये [नाहिं] नहीं [ग्रहे] लेना (उसे अचौर्याणुव्रत कहते हैं) [निज] अपनी [वनिता विन] स्त्री के अतिरिक्त [सकल नारि सों] अन्य सर्व स्त्रियों से [विरत्ता] विरक्त [रहे] रहना (वह ब्रह्मचर्याणुव्रत है) [अपनी] अपनी [शक्ति विचार] शक्ति का विचार करके [परिग्रह] परिग्रह [थोरो] मर्यादित [राखै] रखना (सो परिग्रह-परिमाणाणुव्रत है) [दस दिश] दस दिशाओं में [गमन] जाने-आने की [प्रमाण] मर्यादा [ठान] रखकर [तसु] उस [सीम] सीमा का [न नाखै] उल्लंघन न करना (सो दिग्व्रत है)


देशव्रत

ताहू में फिर ग्राम गली, गृह बाग बजारा
गमनागमन प्रमाण ठान अन, सकल निवारा ॥१२॥
अन्वयार्थ : [फिर] फिर [ताहू में] उसमें (किन्हीं प्रसिद्ध-प्रसिद्ध) [ग्राम] गाँव, [गली] गली, [गृह] मकान, [बाग] उद्यान तथा [बजार] बाजार तक [गमनागमन] जाने-आने का [प्रमाण] माप [ठान] रखकर [अन] अन्य [सकल] सब का [निवारा] त्याग करना (उसे देशव्रत अथवा देशावकाशिक व्रत कहते हैं ।)


अनर्थदण्ड व्रत

काहू की धनहानि, किसी जय-हार न चिन्तै
देय न सो उपदेश, होय अघ वनज कृषी तैं ॥१२॥
कर प्रमाद जल भूमि वृक्ष पावक न विराधै
असि धनु हल हिंसोपकरण नहिं दे यश लाधै
राग-द्वेष-करतार, कथा कबहूँ न सुनीजै
और हु अनरथ दंड, हेतु अघ तिन्हैं न कीजै ॥१३॥
अन्वयार्थ : १. [काहूकी] किसी के [धनहानि] धन के नाश का, [किसी] किसी की [जय] विजय का (अथवा) [हार] किसी की हार का [न चिन्तै] विचार न करना (उसे अपध्यान-अनर्थदंडव्रत कहते हैं ।) २. [बनज] व्यापार और [कृषी तैं] खेती से [अघ] पाप [होय] होता है; इसलिये [सो] उसका [उपदेश] उपदेश [न देय] न देना (उसे पापोपदेश-अनर्थदंडव्रत कहा जाता है ।) ३. [प्रमाद कर] प्रमाद से (बिना प्रयोजन) [जल] जलकायिक, [भूमि] पृथ्वीकायिक, [वृक्ष] वनस्पतिकायिक, [पावक] अग्निकायिक (और वायुकायिक) जीवों का [न विराधै] घात न करना (सो प्रमादचर्या-अनर्थदंडव्रत कहलाता है ।) ४. [असि] तलवार, [धनु] धनुष्य, [हल] हल (आदि) [हिंसोपकरण] हिंसा होने में कारणभूत पदार्थों को [दे] देकर [यश] यश [नहिं लाधै] न लेना (सो हिंसादान-अनर्थदंडव्रत कहलाता है ।) ५. [राग-द्वेष-करतार] राग और द्वेष उत्पन्न करनेवाली [कथा] कथाएँ [कबहूँ] कभी भी [न सुनीजै] नहीं सुनना (सो दुःश्रुति अनर्थदंडव्रत कहा जाता है ।) [और हु] तथा अन्य भी [अघहेतु] पाप के कारण [अनरथ दंड] अनर्थदंड हैं [तिन्हैं] उन्हें भी [न कीजै] नहीं करना चाहिये ।


शिक्षाव्रत

धर उर समताभाव, सदा सामायिक करिये
परव चतुष्टयमाहिं, पाप तज प्रोषध धरिये
भोग और उपभोग, नियमकरि ममत निवारै
मुनि को भोजन देय फेर, निज करहि अहारै ॥१४॥
अन्वयार्थ : [उर] मन में [समताभाव] निर्विकल्पता अर्थात् शल्य के अभाव को [धर] धारण करके [सदा] हमेशा [सामायिक] सामायिक [करिये] करना (सो सामायिक-शिक्षाव्रत है;) [परव चतुष्टयमांहि] चार पर्व के दिनों में [पाप] पाप-कार्यों को छोड़कर [प्रोषध] प्रोषधोपवास [धरिये] करना (सो प्रोषध-उपवास शिक्षाव्रत है;) [भोग] एक बार भोगा जा सके ऐसी वस्तुओं का तथा [उपभोग] बारम्बार भोगा जा सके ऐसी वस्तुओं का [नियमकरि] परिमाण करके-मर्यादा रखकर [ममत] मोह [निवारै] छोड़ दे (सो भोग-उपभोग परिमाणव्रत है;) [मुनि को] वीतरागी मुनि को [भोजन] आहार [देय] देकर [फेर] फिर [निज आहारै] स्वयं भोजन करे (सो अतिथि-संविभागव्रत कहलाता है ।)


व्रतों का फल

बारह व्रत के अतीचार, पन-पन न लगावै
मरण-समय संन्यास धारि तसु दोष नशावै
यों श्रावक-व्रत पाल, स्वर्ग सोलह उपजावै
तहँतें चय नरजन्म पाय, मुनि ह्वै शिव जावै ॥१५॥
अन्वयार्थ : जो जीव [बारह व्रत के] बारह व्रतों के [पन पन] पाँच-पाँच [अतिचार] अतिचारों को [न लगावै] नहीं लगाता और [मरण-समय] मृत्यु-काल में [संन्यास] समाधि [धार] धारण करके [तसु] उनके [दोष] दोषों को [नशावै] दूर करता है वह [यों] इस प्रकार [श्रावक व्रत] श्रावक के व्रत [पाल] पालन करके [सोलम] सोलहवें [स्वर्ग] स्वर्ग तक [उपजावै] उत्पन्न होता है, (और) [तहँतैं] वहाँ से [चय] मृत्यु प्राप्त करके [नरजन्म] मनुष्य-पर्याय [पाय] पाकर [मुनि] मुनि [ह्वै] होकर [शिव] मोक्ष [जावै] जाता है ।


वैराग्य-जननी बारह भावना

मुनि सकलव्रती बड़भागी भव-भोगनतैं वैरागी
वैराग्य उपावन माई, चिन्तैं अनुप्रेक्षा भाई ॥१॥
अन्वयार्थ : [भाई] हे भव्यजीव! [सकलव्रती] महाव्रतों के धारक [मुनि] मुनिराज [बड़भागी] बड़े भाग्यवान हैं कि वे [भोगनतैं वैरागी] संसार और भोगों से विरक्त होते हैं और [वैराग्य उपावन माई] वीतरागता को उत्पन्न करने में, माता के समान [चिन्तैं अनुप्रेक्षा] बारह भावनाओं का चिंतवन करते हैं ।


बारह भावनाओं का कार्य

इन चिन्तत सम-सुख जागै, जिमि ज्वलन पवन के लागै
जब ही जिय आतम जानै, तब ही जिय शिवसुख ठानै ॥२॥
अन्वयार्थ : [इन चिंतत] इन (बारह भावनाओं) के चिंतवन से [सम-सुख जागै] समतारूपी सुख प्रकट होता है [जिमि ज्वलन] जैसे अग्नि [पवन के लागै] वायु के लगने से (भभक उठती है)[जब ही जिय आतम जानै] जब जीव आत्मस्वरूप को जानता है, [तब ही जिय] तभी जीव [शिवसुख ठानै] मोक्षसुख को प्राप्त करता है ।


अनित्य भावना

जोबन गृह गोधन नारी, हय गय जन आज्ञाकारी
इन्द्रिय-भोग छिन थाई, सुरधनु चपला चपलाई ॥३॥
अन्वयार्थ : [जोबन गृह गौ धन नारी] यौवन, मकान, गाय-भैंस, लक्ष्मी, स्त्री [हय गय जन आज्ञाकारी] घोड़ा, हाथी, कुटुम्ब, नौकर-चाकर तथा [इन्द्रिय-भोग] पांच इन्द्रियों के भोग-ये सब [सुरधनु चपला चपलाई] इन्द्रधनुष तथा बिजली की चंचलता-क्षणिकता की भांति [छिन थाई] क्षणमात्र रहनेवाले हैं ।


अशरण भावना

सुर असुर खगाधिप जेते, मृग ज्यों हरि, काल दले ते
मणि मंत्र तंत्र बहु होई, मरते न बचावै कोई ॥४॥

अन्वयार्थ : [सुर असुर खगाधिप जेते] देवों के इन्द्र, असुरों के इन्द्र और खगेन्द्र (गरूड़, हंस) जो-जो हैं, [मृग हरि ज्यों] जिसप्रकार हिरन को सिंह मार डालता है, उसीप्रकार [काल दले] मृत्यु उन सबको नाश करती है । [मणि मंत्र तंत्र बहु होई] मणि, मंत्र, तंत्र बहुत से होने पर भी [मरते न बचावै कोई] मरनेवाले को कोई नहीं बचा सकते।


संसार भावना

चहुँगति दु:ख जीव भरै है, परिवर्तन पंच करै है
सब विधि संसार असारा, यामें सुख नाहिं लगारा ॥५॥
अन्वयार्थ : [चहुंगति दुःख जीव भरै है] चारों गति में जीव दुःख भोगता है और [परिवर्तन पंच करै है] पांच प्रकार से परिभ्रमण करता है; [सब विधि संसार असारा] संसार सर्व प्रकार से असार है, [यामें सुख नाहिं लगारा] इसमें सुख लेशमात्र भी नहीं है ।


एकत्व भावना

शुभ अशुभ करम फल जेते, भोगै जिय एक हि ते ते
सुत दारा होय न सीरी, सब स्वारथ के हैं भीरी ॥६॥
अन्वयार्थ :  [शुभ-अशुभ करमफल जेते] शुभ और अशुभ कर्म के फल जितने हैं, [भौगे जिय एक हि ते ते] उनको यह जीव अकेला ही भोगता है; [सुत दारा] पुत्र, स्त्री [होय न सीरी] साथी नही होते, [सब स्वारथ के हैं भीरी] सब स्वार्थ के सगे हैं ।


अन्यत्व भावना

जल-पय ज्यों जिय-तन मेला, पै भिन्न-भिन्न नहिं भेला
तो प्रकट जुदे धन धामा, क्यों ह्वै इक मिलि सुत रामा ॥७॥
अन्वयार्थ : [जल-पय-ज्यों जिय-तन मेला] पानी और दूध की भांति जीव और शरीर मिले हुए हैं, [पै भिन्न-भिन्न नहिं भेला] तथापि पृथक्-पृथक् हैं, एकरूप नहीं हैं, [तो प्रकट जुदे] फिर जो स्पष्ट पृथक् दिखई देते हैं - ऐसे [धन धामा] लक्ष्मी, मकान, [सुत रामा] पुत्र और स्त्री आदि [इक मिलि] मिलकर एक [क्यों ह्वै] कैसे हो सकते हैं?


अशुचि भावना

पल रुधिर राध मल थैली, कीकस वसादितैं मैली
नव द्वार बहैं घिनकारी, अस देह करे किम यारी ॥८॥
अन्वयार्थ : [पल रूधिर राध] मांस, रक्त, पीव और [मल थैली] विष्टा की थैली, [कीकस वसादितैं मैली] हड्डी, चरबी आदि से अपवित्र, [नव द्वार बहैं घिनकारी] घृणा (ग्लानि) उत्पन्न करनेवाले नौ दरवाजे बहते हैं, [अस देह यारी किमि करै] ऐसे शरीर में प्रेम कैसे किया जा सकता है?


आस्रव-भावना

जो योगन की चपलाई, तातैं ह्वै आस्रव भाई
आस्रव दुखकार घनेरे, बुधिवन्त तिन्हें निरवेरे ॥९॥
अन्वयार्थ : हे भाई! [जो योगन की चपलाई] जो योगों की चंचलता है, [तातैं आस्रव ह्] उससे आस्त्रव होता है; [आस्रव दुःखकार घनेरे] आस्रव अत्यन्त दुःखदायक है, इसलिए [बुधिवन्त तिन्हैं निरवेरे] बुद्धिमान उसे दूर करते हैं ।


संवर भावना

जिन पुण्य-पाप नहिं कीना, आतम अनुभव चित दीना
तिनही विधि आवत रोके, संवर लहि सुख अवलोके ॥१०॥
अन्वयार्थ : [जिन पुण्य पाप] जिन्होंने शुभभाव और अशुभभाव [नहिं कीना] नहीं किये; [आतम अनुभव] आत्मा के अनुभव में [चित दीना] मन को लगाया, [तिनही विधि] उन्होंने ही कर्मों को [आवत रोके] आने से रोका और [संवर लहि] संवर प्राप्त करके [सुख अवलोके] सुख का साक्षात्कार किया है।


निर्जरा भावना

निज काल पाय विधि झरना, तासों निज काज न सरना
तप करि जो कर्म खिपावै, सोई शिवसुख दरसावै ॥११॥
अन्वयार्थ : [निज काल पाय] अपनी-अपनी स्थिति पूर्ण होने पर [विधि झरना] कर्म खिर जाते हैं, [तासों निज काज] उससे (सविपाक निर्जरा से) जीव का धर्मरूपी कार्य [न सरना] नहीं होता; [तप करि जो] जो तप द्वारा [कर्म खिपावै] कर्मों का नाश करती है, [सोई शिवसुख दरसावै] वह (अविपाक निर्जरा) मोक्ष का सुख दिखलाती है ।


लोक-भावना

किनहू न करौ न धरै को, षड् द्रव्यमयी न हरै को
सो लोकमाहिं बिन समता, दुख सहै जीव नित भ्रमता ॥१२॥
अन्वयार्थ : इस लोक को [किनहू न करौ] किसी ने बनाया नहीं है [न धरै को] किसी ने टिका नहीं रखा है, [न हरै को] कोई नाश नहीं कर सकता [षड् द्रव्यमयी] छह प्रकार के द्रव्यमय [सो लोकमाहिं] ऐसे लोक में [बिन समता] समता बिना [जीव नित भ्रमता] सदैव भटकता हुआ जीव [दुख लहै] दुःख सहता है ।


बोधि-दुर्लभ भावना

अंतिम-ग्रीवकलौं की हद, पायो अनन्त विरियाँ पद
पर सम्यग्ज्ञान न लाधौ, दुर्लभ निज में मुनि साधौ ॥१३॥
अन्वयार्थ : [अंतिम ग्रीवकलौं की हद] नवें ग्रैवेयक तक के पद [पायो अनन्त विरियां] अनन्तबार प्राप्त किये, [पर सम्यग्ज्ञान] तथापि सम्यग्ज्ञान [न लाधौ] प्राप्त न हुआ; [दुर्लभ] एसे दुर्लभ सम्यग्ज्ञान को [निज में मुनि साधौ] अपने आत्मा में मुनि धारण करते हैं ।


धर्म-भावना

जो भाव मोहतैं न्यारे, दृग-ज्ञान-व्रतादिक सारे
सो धर्म जबै जिय धारै, तब ही सुख अचल निहारे ॥१४॥
अन्वयार्थ : [जो भाव मोह तैं न्यारे] जो भाव, मोह से रहित, [दृग-ज्ञान-व्रतादिक सारे] साररूप (निश्चय) दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप रत्नत्रय आदिक [सो धर्म] ऐसे धर्म को [जबै जिय धारै] जब जीव धारण करता है, तब ही [सुख अचल निहारै ] अचल सुख (मोक्ष) को प्राप्त करता है ।


मुनि-धर्म के निरूपण की प्रतिज्ञा

सो धर्म मुनिनकरि धरिये, तिनकी करतूत उचरिये
ताको सुनिये भवि प्रानी, अपनी अनुभूति पिछानी ॥१५॥
अन्वयार्थ : [सो धर्म] ऐसा रत्नत्रय धर्म [मुनिनकरि धरिये] मुनियों द्वारा धारण किया जाता है, [तिनकी करतूत] उन मुनियों की क्रियाएं [उचरिये] कही जाती है, [भवि प्रानी] हे भव्यजीवों! [ताको सुनिये] उसे सुनो और [अपनी अनुभूति पिछानी] आत्मा को अनुभव द्वारा पहिचानो ।


पंच महाव्रत

षट्काय जीव न हननतैं, सब विध दरवहिंसा टरी
रागादि भाव निवारतैं, हिंसा न भावित अवतरी
जिनके न लेश मृषा न जल, मृण हू बिना दीयो गहैं
अठदश सहस विध शील धर, चिद्ब्रह्म में नित रमि रहैं ॥१॥
अन्वयार्थ : [षट्काय जीव] छह कायके जीवों को [न हननतैं] घात न करने से [सब विध] सर्व प्रकार से [दरवहिंसा] द्रव्य-हिंसा [टरी] दूर हो जाती है और [रागादि भाव] रागादि (राग-द्वेष, काम, क्रोध, मान, माया, लोभ आदि) भावों को [निवारतैं] दूर करने से [भावित हिंसा] भाव-हिंसा भी [न अवतरी] नहीं होती, [जिनके] उन मुनियों को [लेश] किंचित् [मृषा] झूठ [न] नहीं होती, [जल] पानी और [मृण] मिट्टी [हू] भी [बिना दीयो] दिये बिना [न गहैं] ग्रहण नहीं करते तथा [अठदशसहस] अठारह हजार [विध] प्रकार के [शील] शील (ब्रह्मचर्य) को [धर] धारण
करके [नित] सदा [चिद्ब्रह्ममें] चैतन्य-स्वरूप आत्मा में [रमि रहैं] लीन रहते हैं ।


अपरिग्रह और समिति

अंतर चतुर्दस भेद बाहिर, संग दसधा तैं टलैं
परमाद तजि चौकर मही लखि, समिति ईर्या तैं चलैं
जग-सुहितकर सब अहितहर, श्रुति सुखद सब संशय हरैं
भ्रमरोग-हर जिनके वचन-मुखचन्द्र तैं अमृत झरैं ॥२॥
अन्वयार्थ : (वे वीतरागी दिगम्बर जैन मुनि) [चतुर्दस भेद] चौदह प्रकार के [अन्तर] अंतरंग तथा [दसधा] दस प्रकार के [बाहिर] बहिरंग [संग] परिग्रह से [टलैं] रहित होते हैं । [परमाद] प्रमाद (असावधानी) [तजि] छोड़कर [चौकर] चार हाथ [मही] जमीन [लखि] देखकर [ईर्या] ईयापथ [समिति तैं] समिति से [चलैं] चलते हैं और [जिनके] जिन (मुनिराजों) के [मुखचन्द्र तैं] मुखरूपी चन्द्रमा से [जग सुहितकर] जगत का सच्चा हित करनेवाला तथा [सब अहितकर] सर्व अहित का नाश करनेवाला, [श्रुति सुखद] सुनने में प्रिय लगे ऐसा [सब संशय] समस्त संशयों का [हरैं] नाशक और [भ्रम रोगहर] मिथ्यात्वरूपी रोग को हरनेवाला [वचन-अमृत] वचनरूपी अमृत [झरैं] झरता है ।


शेष तीन समिति

छ्यालीस दोष बिना सुकुल, श्रावकतनैं घर अशन को
लैं तप बढ़ावन हेतु, नहिं तन-पोषते तजि रसन को
शुचि ज्ञान संयम उपकरण, लखिकैं गहैं लखिकैं धरैं
निर्जन्तु थान विलोकि तन-मल मूत्र श्लेष्म परिहरैं ॥३॥
अन्वयार्थ : (वीतरागी मुनि) [सुकुल] उत्तम-कुल वाले [श्रावकतनैं] श्रावक के घर और [रसन को] छहों-रस अथवा एक-दो रसों को [तजि] छोड़कर [तन] शरीर को [नहिं पोषतैं] पुष्ट न करते हुए - मात्र [तप] तप की [बढ़ावन हेतु] वृद्धि करने के हेतु से (आहार के) [छयालीस] छियालीस [दोष बिना] दोषों को दूर करके [अशनको] भोजन को [लैं] ग्रहण करते हैं । [शुचि] पवित्रता के [उपकरण] साधन (कमण्डल) को, [ज्ञान] ज्ञान के [उपकरण] साधन (शास्त्र) को, तथा [संयम] संयम के [उपकरण] साधन (पींछी) को [लखिकैं] देखकर [गहैं] ग्रहण करते हैं और [लखिकैं] देखकर [धरैं] रखते हैं; [मूत्र] पेशाब, [श्लेष्म] श्लेष्म (कफ) [तन-मल] शरीर के मैल को [निर्जन्तु] जीव-रहित [थान] स्थान [विलोकि] देखकर [परिहरैं] त्यागते हैं ।


गुप्ति और इंद्रियजय

सम्यक् प्रकार निरोध मन वच काय, आतम ध्यावते
तिन सुथिर मुद्रा देखि मृगगण उपल खाज खुजावते
रस रूप गंध तथा फरस अरु शब्द शुभ असुहावने
तिनमें न राग विरोध पंचेन्द्रिय-जयन पद पावने ॥४॥
अन्वयार्थ : (वीतरागी मुनि) [मन वच काय] मन-वचन-काया का [सम्यक् प्रकार] भली-भाँति-बराबर [निरोध] निरोध करके, जब [आतम] अपने आत्मा का [ध्यावते] ध्यान करते हैं, तब [तिन] उन मुनियोंकी [सुथिर] सुथिर-शांत [मुद्रा] मुद्रा [देखि] देखकर, उन्हें [उपल] पत्थर समझकर [मृगगण] हिरन (चौपाये प्प्राणी) समूह [खाज] अपनी खाज (खुजली) को [खुजावते] खुजाते हैं । (जो) [शुभ] प्रिय और [असुहावने] अप्रिय (पाँच इन्द्रियों सम्बन्धी) [रस] पाँच रस, [रूप] पाँच वर्ण, [गंध] दो गंध, [फरस] आठ प्रकार के स्पर्श, [अरु] और [शब्द] शब्द–[तिनमें] उन सब में [राग-विरोध] राग या द्वेष [न] मुनि को नहीं होते, (इसलिये वे मुनि) [पंचेन्द्रिय जयन] पाँच इन्द्रियों को
जीतनेवाला अर्थात् जितेन्द्रिय [पद] पद [पावने] प्राप्त करते हैं ।


छह आवश्यक

समता सम्हारैं, थुति उचारैं, वन्दना जिनदेव को
नित करैं श्रुति-रति, करैं प्रतिक्रम, तजैं तन अहमेव को
जिनके न न्हौन, न दंतधोवन, लेश अम्बर आवरन
भू माहिं पिछली रयनि में कछु शयन एकासन करन ॥५॥
अन्वयार्थ : (वीतरागी मुनि) [नित] सदा [समता] सामायिक [सम्हारैं] सम्हालकर करते हैं, [थुति] स्तुति [उचारैं] बोलते हैं । [जिनदेव को] जिनेन्द्र भगवान की [वन्दना] वन्दना करते हैं । [श्रुतिरति] स्वाध्याय में प्रेम [करैं] करते हैं, [प्रतिक्रम] प्रतिक्रमण [करैं] करते हैं, [तन] शरीर की [अहमेव को] ममता को [तजैं] छोड़ते हैं । [जिनके] उन (मुनियों) के [न न्हौन न दंतधोवन] स्नान और दाँतों को स्वच्छ करना नहीं होता, [अंबर आवरन] शरीर ढँकने के लिये वस्त्र [लेश] किंचित् भी उनके [न] नहीं होता और [पिछली रयनिमें] रात्रिके पिछले भाग में [भूमाहिं]
धरती पर [एकासन] एक करवट [कछु] कुछ समय तक [शयन करन] शयन करते हैं ।


परीषह-जय

इक बार दिन में लें अहार, खड़े अलप निज-पान में
कचलोंच करत न डरत परिषह सौं, लगे निज ध्यान में
अरि मित्र महल मसान कंचन, काँच निन्दन थुति करन
अर्घावतारन असि-प्रहारन में सदा समता धरन ॥६॥
अन्वयार्थ : (वे वीतरागी मुनि) [इकबार दिन में] दिन में एक बार [खड़े] खड़े रहकर और [निज-पान में] अपने हाथ में रखकर [अल्प] थोड़ा-सा [लें अहार] आहार लेते हैं; [कचलोंच करत] केशलोंच करते हैं, [निज ध्यान में] अपने आत्मा के ध्यान में [लगे] तत्पर होकर [परिषह सौं] (बाईस प्रकार के) परिषहों से [न डरत] नहीं डरते और [अरि मित्र] शत्रु या मित्र, [महल मसान] महल या श्मशान, [कंचन काँच] सोना या काँच [निन्दन थुति करन] निन्दा या स्तुति करनेवाले, [अर्घावतारन] पूजा करनेवाले और [असि-प्रहारन] तलवार से प्रहार करनेवाले उन सब में [सदा] सदा [समता धरन] समताभाव धारण करते हैं ।


रत्नत्रय के धारी

तप तपैं द्वादश, धरैं वृष दश, रतनत्रय सेवैं सदा
मुनि साथ में वा एक विचरैं चहैं नहिं भवसुख कदा
यों है सकल संयम चरित, सुनिये स्वरूपाचरन अब
जिस होत प्रकटै आपनी निधि, मिटै पर की प्रवृत्ति सब ॥७॥
अन्वयार्थ : (वे वीतरागी मुनि सदा) [तप तपैं द्वादश] बारह प्रकार के तप करते हैं; [वृष दश] दस प्रकार के धर्म को [धरैं] धारण करते हैं और [रतनत्रय] सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र का [सदा] सदा [सेवैं] सेवन करते हैं । [मुनि साथ में] मुनियों के संघ में [वा] अथवा [एक विचरैं] अकेले विचरते हैं और [भवसुख कदा] किसी भी समय (सांसारिक) सुखों की [नहिं चहैं] इच्छा नहीं करते । [यों] इसप्रकार [है सकल संयम चरित] सकल संयम चारित्र है; [सुनिए स्वरूपाचरण अब] अब स्वरूपाचरण चारित्र सुनो । [जिस होत प्रकटे] जो (स्वरूपाचरण चारित्र) के प्रगट होने से [प्रगटै आपनी निधि] अपने आत्मा की (ज्ञानादिक) सम्पत्ति प्रगट होती है तथा [सब] सर्व प्रकार से [मिटै पर की प्रवृत्ति] पर-वस्तुओं की ओर की प्रवृत्ति मिट जाती है ।


स्वरूप-स्थिरता

जिन परम पैनी सुबुधि छैनी, डारि अन्तर भेदिया
वरणादि अरु रागादितैं निज भाव को न्यारा किया
निजमाहिं निज के हेतु निजकर, आपको आपै गह्यो
गुण गुणी ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय मँझार कछु भेद न रह्यो ॥८॥
अन्वयार्थ : [जिन] उन (वीतरागी मुनिराज) ने [परम पैनी] अत्यंत तीक्ष्ण [सुबुधि] सम्यग्ज्ञान अर्थात् भेदविज्ञानरूपी [छैनी डारि] छैनी पटककर [अन्तर भेदिया] अन्तरंग में भेदकर के [निजभाव को] आत्मा के वास्तविक स्वरूप को [वरणादि] वर्ण, रस, गंध, तथा स्पर्शरूप द्रव्य-कर्म से [अरु] और [रागादितैं] राग-द्वेषादिरूप भाव-कर्म से [न्यारा किया] भिन्न करके [निजमांहिं] अपने आत्मा में [निज के हेतु] अपने लिये [निजकर] अपने द्वारा [आपको] आत्मा को [आपै] स्वयं अपने से [गह्यो] ग्रहण करते हैं, तब [गुण गुणी] गुण और गुणी (द्रव्य), [ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय मँझार] ज्ञाता (आत्मा), ज्ञान (साधन, करण), ज्ञान का विषय के मध्य [कछु भेद न रह्यो] किंचित्मात्र भेद (विकल्प) नहीं रहा ।


आत्मानुभूति

जहँ ध्यान ध्याता ध्येय को न विकल्प, वच भेद न जहाँ
चिद्भाव कर्म, चिदेश करता, चेतना किरिया तहाँ
तीनों अभिन्न अखिन्न शुध उपयोग की निश्चल दशा
प्रकटी जहाँ दृग-ज्ञान-व्रत ये, तीनधा एकै लसा ॥९॥
अन्वयार्थ : [जहँ] जिस स्वरूपाचरण-चारित्र में [ध्यान] ध्यान, [ध्याता] ध्याता और [ध्येयको] ध्येय - इन तीनों के [विकल्प] भेद [न] नहीं होते तथा [जहाँ] जहाँ [वच] वचन का [भेद न] विकल्प नहीं होता, [तहाँ] वहाँ तो [चिद्भाव] आत्मा का स्वभाव ही [कर्म] कर्म, [चिदेश] आत्मा ही [करता] कर्ता, [चेतना] चैतन्यस्वरूप आत्मा ही [किरिया] क्रिया होता है -- अर्थात् कर्ता, कर्म और क्रिया–ये तीनों [अभिन्न] भेदरहित-एक, [अखिन्न] अखण्ड (बाधारहित) हो जाते हैं और [शुध उपयोगकी] शुद्ध-उपयोग की [निश्चल] निश्चल [दशा] पर्याय [प्रगटी] प्रगट होती है; [जहाँ] जिसमें [दृग-ज्ञान-व्रत] सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र [ये तीनधा] यह तीनों [एकै] एकरूप (अभेदरूप) से [लसा] शोभायमान होते हैं ।


निर्विकल्प दशा

परमाण नय निक्षेप को न उद्योत अनुभव में दिखै
दृग-ज्ञान-सुख-बलमय सदा, नहिं आन भाव जु मो विखै
मैं साध्य साधक मैं अबाधक, कर्म अरु तसु फलनितैं
चित् पिंड चंड अखंड सुगुणकरंड च्युत पुनि कलनितैं ॥१०॥
अन्वयार्थ : (उस स्वरूपाचरण-चारित्र के समय मुनियों के) [अनुभवमें] आत्मानुभव में [परमाण] प्रमाण, [नय] नय और [निक्षेप को] निक्षेप का विकल्प [उद्योत] प्रगट [न दिखै] दिखाई नहीं देता, (परन्तु ऐसा विचार होता है कि) [मैं] मैं [सदा] सदा [दृग-ज्ञान-सुख-बलमय] अनन्तदर्शन-अनन्तज्ञान-अनन्तसुख और अनन्तवीर्यमय हूँ । [मो विखै] मेरे स्वरूप में [आन] अन्य राग-द्वेषादि [भाव] भाव [नहिं] नहीं हैं, [मैं] मैं [साध्य] साध्य, [साधक] साधक तथा [कर्म] कर्म [अरु] और [तसु] उसके [फलनितैं] फलों के [अबाधक] विकल्प-रहित [चित् पिंड] ज्ञान-दर्शन-चेतनास्वरूप [चण्ड] निर्मल तथा ऐश्वर्यवान [अखंड] अखंड [सुगुण करंड] सुगुणों का भंडार [पुनि] और [कलनितैं] अशुद्धता से [च्युत] रहित हूँ ।


आत्मध्यान का फल केवलज्ञान

यों चिन्त्य निज में थिर भये, तिन अकथ जो आनंद लह्यो
सो इन्द्र नाग नरेन्द्र वा अहमिन्द्रकैं नाहीं कह्यो
तब ही शुकल ध्यानाग्नि करि, चउघाति विधि कानन दह्यो
सब लख्यो केवलज्ञानकरि, भविलोक को शिवमग कह्यो ॥११॥
अन्वयार्थ : )स्वरूपाचरण-चारित्र में) [यों] इस प्रकार [चिन्त्य] चिंतवन करके [निज में] आत्मस्वरूप में [थिर भये] लीन होने पर [तिन] उन मुनियोंको [जो] जो [अकथ] कहा न जा सके ऐसा (वचन से पार) [आनन्द] आनन्द [लह्यो] होता है [सो]वह आनन्द [इन्द्र] इन्द्र को, [नाग] नागेन्द्र को, [नरेन्द्र] चक्रवर्ती को [वा अहमिन्द्रको] या अहमिन्द्र को [नहीं कह्यो] कहने में नहीं आया (नहीं होता)[तब ही] वह स्वरूपाचरण-चारित्र प्रगट होने के पश्चात् जब [शुक्ल ध्यानाग्नि करि] शुक्ल-ध्यानरूपी अग्नि द्वारा [चउघाति विधि कानन] चार घाति-कर्मोंरूपी वन [दह्यो] जल जाता है और [केवलज्ञानकरि] केवलज्ञान से [सब] तीनकाल और तीन-लोक में होनेवाले समस्त पदार्थों के सर्वगुण तथा पर्यायों को [लख्यो] प्रत्यक्ष जान लेते हैं, तब [भविलोकको] भव्य-जीवों को [शिवमग] मोक्षमार्ग [कह्यो] बतलाते हैं ।


सिद्ध दशा

पुनि घाति शेष अघाति विधि, छिनमाहिं अष्टम भू वसैं
वसु कर्म विनसैं सुगुण वसु, सम्यक्त्व आदिक सब लसैं
संसार खार अपार पारावार तरि तीरहिं गये
अविकार अकल अरूप शुचि, चिद्रूप अविनाशी भये ॥१२॥
अन्वयार्थ : [पुनि] केवलज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् [शेष] शेष चार [अघाति विधि] अघातिया कर्मों का [घाति] नाश करके [छिनमांहि] कुछ ही समयमें [अष्टम भू] आठवीं पृथ्वी (ईषत् प्राग्भार) मोक्ष-क्षेत्र में [वसैं] निवास करते हैं; उनको [वसु कर्म] आठ कर्मों का [विनसैं] नाश हो जाने से [सम्यक्त्व आदिक] सम्यक्त्वादि [सब] समस्त [वसु सुगुण] आठ मुख्य गुण [लसैं] शोभायमान होते हैं । (ऐसे सिद्ध होनेवाले मुक्तात्मा) [संसार खार अपार पारावार] संसाररूपी खारे तथा अगाध समुद्र को [तरि] पार करके [तीरहिं] किनारे पर [गये] पहुँच जाते हैं और [अविकार] विकार-रहित, [अकल] शरीर-रहित, [अरूप] रूप-रहित, [शुचि] शुद्ध-निर्दोष [चिद्रूप] दर्शन-ज्ञान-चेतनास्वरूप तथा [अविनाशी] नित्य-स्थायी [भये] होते हैं ।


सिद्ध जीव धन्य

निजमाहिं लोक-अलोक गुण, परजाय प्रतिबिम्बित थये
रहिहैं अनन्तानन्त काल, यथा तथा शिव परिणये
धनि धन्य हैं जे जीव, नरभव पाय यह कारज किया
तिनही अनादि भ्रमण पंच प्रकार तजि वर सुख लिया ॥१३॥
अन्वयार्थ : [निजमांहि] (उन सिद्धभगवान के) आत्मा में [लोक-अलोक] लोक तथा अलोक के [गुण, परजाय] गुण और पर्यायें [प्रतिबिम्बित थये] झलकने लगते हैं (ज्ञात होने लगते हैं); वे [यथा] जिसप्रकार [शिव] मोक्षरूप से [परिणये] परिणमित हुए हैं [तथा] उसीप्रकार [अनन्तानन्त काल] अनन्त-अनन्त काल तक [रहिहैं] रहेंगे ।[जे] जिन [जीव] जीवों ने [नरभव पाय] पुरुष-पर्याय प्राप्त करके [यह] यह (मुनिपद आदि की प्राप्तिरूप) [कारज] कार्य [किया] किया है, वे जीव [धनि धन्य हैं] धन्य हैं और धन्यवाद के पात्र हैं और [तिनही] उन्हीं जीवों ने [अनादि] अनादिकाल से चले आ रहे [पंच प्रकार] पाँच प्रकार के परिवर्तनरूप [भ्रमण] संसार-परिभ्रमण को [तजि] छोड़कर [वर] उत्तम [सुख] सुख [लिया] प्राप्त किया है ।


निजहित के लिए प्रेरणा

मुख्योपचार दु भेद यों बड़भागि रत्नत्रय धरैं
अरु धरेंगे ते शिव लहैं, तिन सुयश-जल-जग-मल हरैं
इमि जानि आलस हानि साहस ठानि, यह सिख आदरौ
जबलों न रोग जरा गहै, तबलौं झटिति निज हित करौ ॥१४॥
अन्वयार्थ : [बढ़भागि] जो महा पुरुषार्थी जीव [यों] इसप्रकार [मुख्योपचार] निश्चय और व्यवहार [दुभेद] ऐसे दो प्रकार के [रत्नत्रय] रत्नत्रय को [धरैं अरु धरेंगे] धारण करते हैं और करेंगे [ते] वे [शिव] मोक्ष [लहैं] प्राप्त करते हैं और [तिन] उन जीवों का [सुयश-जल] सुकीर्तिरूपी जल [जग-मल] संसाररूपी मैल को [हरैं] नाश करता है । [इमि] ऐसा [जानि] जानकर [आलस] प्रमाद (स्वरूप में असावधानी) [हानि] छोड़कर [साहस] पुरुषार्थ [ठानि] करके [यह] यह [सिख] शिक्षा-उपदेश [आदरौ] ग्रहण करो कि [जबलौं] जब तक [रोग जरा] रोग या वृद्धावस्था [न गहै] न आये [तबलौं] तब तक [झटिति] शीघ्र [निज हित] आत्मा का हित [करौ] कर लेना चाहिये ।


हेय उपादेय

यह राग-आग दहै सदा, तातैं समामृत सेइये
चिर भजे विषय-कषाय अब तो, त्याग निजपद बेइये
कहा रच्यो पर पद में, न तेरो पद यहै, क्यों दुख सहै
अब "दौल''! होउ सुखी स्वपद-रचि, दाव मत चूकौ यहै ॥१५॥
अन्वयार्थ : [यह] यह [राग-आग] रागरूपी अग्नि [सदा] अनादिकाल से निरन्तर जीव को [दहै] जला रही है, [तातैं] इसलिये [समामृत] समतारूप अमृत का [सेइये] सेवन करना चाहिये । [विषय-कषाय] विषय-कषाय का [चिर भजे] अनादिकाल से सेवन किया है, [अब तो] अब तो [त्याग] उसका त्याग करके [निजपद] आत्म-स्वरूप को [बेइये] जानना चाहिये (प्राप्त करना चाहिये)[पर पद में] पर-पदार्थों में (परभावों में) [कहा] क्यों [रच्यो] आसक्त-सन्तुष्ट हो रहा है? [पद यहै] यह पद [न तेरो] तेरा नहीं है । [क्यों दुख सहै] दुःख किसलिये सहन करता है? [दौल !] हे दौलतराम ! [अब] अब [स्वपद] अपने आत्मपद (सिद्धपद) में [रचि] लगकर [सुखी] सुखी [होउ] होओ !
[यह] यह [दाव] अवसर [मत चूकौ] न गँवाओ !


प्रशस्ति छन्द
इक नव वसु इक वर्ष की, तीज शुक्ल वैशाख
कर्यो तत्त्व-उपदेश यह, लखि बुधजन की भाख
लघु-धी तथा प्रमादतैं, शब्द अर्थ की भूल
सुधी सुधार पढ़ो सदा, जो पावो भव-कूल ॥
अन्वयार्थ : पण्डित बुधजनकृत छहढाला के कथन का आधार लेकर (पंडित जनों के लिए) मैंने (दौलतराम ने) विक्रम संवत १८९१, वैशाख शुक्ला ३ (अक्षय तृतीया) के दिन इस छहढाला ग्रन्थ की रचना की है । मेरी अल्पबुद्धि तथा प्रमादवश उसमें कहीं शब्द की या अर्थ की भूल रह गई हो तो बुद्धिमान उसे सुधारकर पढ़ें, ताकि जीव संसार-समुद्र को पार करने में शक्तिमान हो ।




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